Sunday, 23 October 2016

।। भोजन के नियम व रस।।

  ।। भोजन नियम व रस।।

हमारे भोजन में 6 रस  होते है । इसीलिए हमारे भोजन को षडरस कहा जाता है ।  

१. अम्ल ( खट्टा ) २. मधुर ( मीठा ) ३. लवण ( नमकीन )  ४.कटु ( कडुवा )  ५. तिक्त ( चरपरा ) ६. कषाय ( कसैला )

प्रत्येक रस का सेवन नियमित एवं सीमिति मात्रा में किया जाता है , अधिक या कम मात्रा में सेवन से विमारियां पैदा होती है ।

1. मधुर ( Sweet चीनी ) :- मन में तृप्ति मिलती है ।
  यह वात और पित्त का शमन करता है जबकि कफ को विकृत करता है  ।
  धातु एवं ओज की वृद्धि करते हुए ज्ञानेन्द्रियों को स्वच्छ रखता है ।
इस रस को अधिक सेवन करने से आलस्य व कम सेवन करने से कमजोरी महसूस होती है  ।

2. अम्ल ( खट्टा Acid नीबूं ) :-  अधिक सेवन से मुंह व गले में जलन उत्पन्न करता है ।

यह मुंह से लार को उत्पन्न करता है*।
यह वात का शमन करता है , तथा पित्त एवं कफ को विकृत करता है  ।

3. लवण ( नमक /पटु Salt ):- यह मुँह में डालते ही घुलता है , इसका अधिक सेवन जलन पैदा करता है ।

यह वात का शमन करता है  ।  जबकि  पित्त एवं कफ़ को विकृत करता है  ।

  लवण की अधिकता से नपुंसकता , बांझपन , रक्तपित्त आदि विमारियाँ होती है ।

  लवण के कमी से भोजन में अरुचि व पाचन क्रिया को प्रभावित करता है ।

4. कटु ( कड़वा pungent करेला , नीम ):-

यह जीभ के संपर्क में आते ही कष्ट पहुँचाता है  ।
इसके संपर्क से आँखों व मुँह से जलस्राव होता है ।
यह कफ का शमन करता है परन्तु  वात व पित्त को विकृत करता है  ।

मेथी , मंगरैला , अजवाइन आदि ।

5. तिक्त ( उष्ण Bitter मिर्च ) :- यह जीभ को अप्रिय होता है , स्वाद में एकाधिकार होने के कारण इसकी उपस्थिति में अन्य स्वाद का पता नहीं लगता है ।

यह वात को विकृत करता है जबकि पित्त व कफ का शमन करता है ।

  तिक्त रस हल्दी में भी पाया जाता है ।

  6. कषाय ( कसैला Astringent आंवला ) :-
इसके सेवन से जीभ की चिपचिपाहट दूर होता है ।
यह अन्य रसों को अनुभव नहीं करने देता है ।
यह पित्त एवं कफ को शमन करता है परन्तु वात को विकृत करता है  ।

   हमें अपना भोजन अपनी प्रकृति को ध्यान में रखते  हुए करना चाहिए , तभी आपका वात-पित्त-कफ  इन षडरसों द्वारा नियंत्रित होगा । और आपका आहार सुखदायी होगा । अपनी प्रकृति के विपरीत रसों के सेवन से आपका वात-पित्त-कफ कुपित होगा और आप अस्वस्थ्य होंगें ।

प्रातः के सूखा पदार्थ सर्वप्रथम खायें , फिर द्रव्य पदार्थ लें इसके बाद भारी चिकना और हल्का मीठा पदार्थ पहले लें, यदि फल है तो पहले मीठे फल खाएं । अम्ल व लवण मध्य मे खायें , कडुवा , तीखा व कसैला अंत मे खायें । यदि भूख कम लगती है तो गर्म पदार्थ पहले खायें ।
अति मधुर भोजन अग्नि को नष्ट करता है  ।
अत्यंत लवण युक्त भोजन आंखो के लिए हानिकारक है ।
अति तीक्ष्ण व अति अम्ल युक्त भोजन वृद्धावस्था को बढ़ाता है ।

👉🏻 दही , मधु , घृत , सत्तू , खीर, कांजी , को छोड़कर अन्य आहार द्रव्य खाते समय थोड़ा छोड़ना चाहिए ।

पेट दर्द मे घी के साथ मिश्रित हींग
  पुराने ज्वर मे मधु के साथ पेपर
वातरोग मे घी मे भुना लहसुन लाभप्रद है ।

     इसे ऐसे समझे :-

    रसों का दोषों से सम्बन्ध :-

दोष  लाभकारी रस    प्रकोप
                                    रस 
वात - मधुर,अम्ल ।  कटु , 
          लवण ।    तिक्त ,कषाय
                          
पित्त - तिक्त,कषाय। अम्ल,
          मधुर।      कटु , लवण ,
           
कफ - कटु, तिक्त। मधुर,
          कषाय ।  अम्ल, लवण
                      

।। रसों का पंचभूतों से सम्बन्ध।।
          
रस                        महाभूत
1. मधुर रस           पृथ्वी , जल
2. अम्ल रस          पृथ्वी , अग्नि
3. लवण रस          जल , अग्नि
4. तिक्त रस           वायु, आकाश
5. कटु रस              वायु , अग्नि
6. कषाय रस           वायु , पृथ्वी

  आयुर्वेद में तीन-तीन रसों का संयुग्म बनाया गया है , जिनसे वात-पित्त-कफ असंतुलित भी होते और संतुलित भी होते है जाने कैसे ..?

तत्राद्या मारूतं धन्ति त्रयस्तदाय: किम् ,
कषायतिक्तमधुरा: पित्तमन्ये तु कुर्ते  ।।
  
  कफ वर्धक व कफ शामक :-  यदि आपके भोजन में मीठे , खट्टे , और नमकीन पदार्थ होंगे तो आपका कफ बढेगा । लेकिन यदि आपके भोजन में कडुवे , चरपरे , कसैले पदार्थ हैं तो आपका कफ शांत होगा ।

  पित्त वर्धक व पित्त शामक :-  यदि आपके भोजन में कडुवे , नमकीन , खट्टे पदार्थ होंगे तो यह आपके पित्त को बढ़ाएंगे जबकि मीठे , चरपरे कसैले  पदार्थ पित्त को शांत करेंगे ।

वात-वर्धक व वात शामक :- कडुवे , चरपरे कसैले आहार  आपके वात को बढ़ा देते हैं जबकि मीठे,  खट्टे और नमकीन  युक्त भोज्य पदार्थो के सेवन से आपका वात नियंत्रित होता है ।

    => यह हमेशा ध्यान रखे कि आपके भोजन में आपके प्रकृति के विपरीत पदार्थों की मात्रा अल्प हो तथा आपके प्रकृति के अनुरूप भोजन में पदार्थों की मात्रा अधिक हो ।

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