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Historical journey of Pi

Historical journey of Pi 
पाई की ऐतिहासिक यात्रा 
वृत के परिधि तथा व्यास के अनुपात को पाई के रूप व्यक्त किया जाता है जिसका स्थूल मान 3 है, परिमेय संख्या के रूप में मान   22 /7 तथा 3.1416 है तथा अपरिमेय संख्या के रूप में (10)^½ है। इसकी ऐतिहासिक यात्रा वैदिक काल से प्रारंभ होकर वर्तमान में शोधकर्ताओं के लिए और अधिक शोध करने की प्रेरणा देता रहता है। भारत तथा विश्व के सभी गणितज्ञों वृत के परिधि तथा व्यास के अनुपात में रुचि दिखाई तथा कुछ न कुछ नया खोजने का प्रयास किया है परन्तु भारतीय गणितज्ञों ने गणित के क्षेत्र में जो योगदान दिया वो अविस्मरणीय है।
शुल्व-सूत्रों में वृत-संरचना के लिए अनेक नियम निर्धारित किये गये हैं। उनके अनेक विवरणों से पाई के अनेक प्रायः समतुल्य मान ध्वनित होते हैं। शुल्व-सूत्र के पूर्वोक्त उदाहरण से पाई का मान 3. 004 का अनुमान लगाया गया है। मानव शुल्बसूत्र  ( 1800 ई. पू.) से यह मान 3. 1604 द्योतित हुआ है।
पाई का स्थूल मान 3 के लिए —
यूपावटाः पदविष्कम्भाः।
त्रिपदपरिणाहानि यूपोपराणि।।
                        ( बा. शु. सू. - 4. 112. 13)
अर्थात -
यूप या खूँटे का व्यास 1 पद होने पर उसकी परिधि 3 पद होती है।
इस प्रकार पाई का मान 3 इस स्थूल मान का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है
प्रसिद्ध विद्वान आर्किमिडीज़ ( Archimedes 287 - 212 B. C.) ने इसका मान 22 /7 तथा 223/71 अर्थात 3.1428 तथा 3.1408 के मध्य स्वीकृत किया था।
~ आर्यभट्ट :-
इन सभी विवेचना के बाद विश्व में सबसे सुनिश्चित तथा चार स्थानों तक सर्वथा शुद्ध मान को निर्धारित करने का श्रेय गणित के महाविद्वान आर्यभट्ट ( 476 ई. से 540 ई.) को प्राप्त है -
चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्त्राणाम् ।
अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत-पारिणाहः।।
                  (-आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक - 10)
अर्थात -
अयुतद्वय या 20000 प्रमाण व्यास वाले वृत की परिणाह या परिधि 1000 में 62 गुणित में 104 में 8 से गुणित संख्या को जोड़ने से प्राप्त संख्या आसन्न होती है। इस प्रकार यह संख्या —
( 1000 × 62) + ( 104 × 8)
= 62000 + 832
= 62832
इस प्रकार परिधि /व्यास के रुप में इसका मान —
पाई = 62832 / 20000
      = 3.1416
~ श्रीधराचार्य :-
श्रीधराचार्य ( 750 ई.) ने अपने परिधि निरुपण के प्रसंग में पाई का मान (10)^½ निरुपित किया है —
वृतव्यासस्य कृतेमूलं परिधिर्भवति दसगुणायाः ।
                     (-त्रिशतिका, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक - 45)
अर्थात -
वृत के व्यास की कृति या वर्ग के 10 से गुणित का वर्गमूल परिधि होता है। इससे यह परिणाम निकलता है कि —
परिधि = { 10 ×( व्यास)²} ^½
अतः पाई { (10)^½} = परिधि /व्यास
कुछ प्रसंग में इन्होंने पाई का स्थूल मान 3 मान कर भी गणनाएं की है।
~ महावीराचार्य :-
महावीराचार्य (814 ई. से 880 ई.) ने भी ठीक इसी प्रकार परिधि का निरुपण करते हुए पाई का मान (10)^½ बताया है —
वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपादगुणितो भवेत् परिक्षेपः ।
            (-गणितसारसंग्रह, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक - 60)
अर्थात -
वृताकार क्षेत्र के व्यास को 10 के वर्गमूल से गुणित करने पर उसका परिधि प्राप्त होता है
अन्य प्रसंग में
त्रिगुणीकृतविष्कम्भः परिधिः
                         (-गणितसारसंग्रह, श्लोक - 19)
के द्वारा व्यास के तिगुने को स्थूल परिधि बताते हुए स्थूल रूप से पाई का मान 3 भी स्वीकृत किया है।
~ भास्कराचार्य :-
आर्यभट्ट के पश्चात सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने उनके मान के विवरण को संक्षिप्त करके इस रुप में प्रस्तुत किया है —
व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते खबाणसूर्यैः परिधिः स सूक्ष्मः।
अर्थात -
1250 से विभक्त 3927 संख्या को व्यास से गुणित करने पर उस व्यास की सुक्ष्म परिधि प्राप्त होती है। इससे प्राप्त पाई का मान आर्यभट्ट के विवरण का ही संक्षिप्त रुप है —
पाई = (62832 ÷ 16) / (20000÷ 16)
       = 3927 / 1250
       = 3.1416
उन्होंने अगले चरण में पाई का स्थूल मान इस तरह प्रकट किया है —
द्वाविंशतिघ्ने विहृतेsथ शैलेः स्थूलोsथवा स्याद् व्यवहारयोग्यः ।
                 (-लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक - 40)
अर्थात -
7 से विभाजित 22 को व्यास से गुणा करने पर उस परिधि का स्थूल मान प्राप्त होता है। इससे प्राप्त
    पाई  = 22 /7
यह मान आर्किमिडिज के मान की अधिकतम सीमा के रुप में आधुनिक गणित में भी प्रचलित है।
अधोलिखित श्लोक का वर्ण कूटांक की दृष्टि से विचार करें.....
"चन्द्रांशु चंद्रा धमकुंभिपाला।
आनूननून्ननन नुन्न नित्यम्।। "
इसका अभिप्राय है कि " आनूननून्नानन नुन्न नित्यम् "  व्यास के वृत की परिधि " चन्द्रांशु चंद्रा धमकुंभिपाल " होती है।
व्यास  =  1  आनूननून्नानन नुन्न नित्यम्
                 000000, 000, 01
परिधि  =   चन्द्रांशु चंद्रा धमकुंभि पाल
                  6 3 5   6 2    9 5 1 4   1 3
पाई = परिधि /व्यास
       = 31415926526 /10000000000
       = 3.1415926526
अर्थात - दशमलव के दस अंक तक पाई का मान इस श्लोक में दिया गया है।
~माधवा ( 1340 ई. - 1425 ई.)
14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा गणितज्ञ माधवा जिनका जन्म केरल के संगमग्राम (आधुनिक ईरिन्नालाक्कुट्टा) में 1340 ई. में हुआ था —
इनके द्वारा पाई का मान दशमलव के ग्यारह अंकों तक शुद्ध पाया जाता है —
    2827,43,33,88,2333 ÷ 900,00,00,00,000
    = 3. 1415926535922
~शंकर वर्मा ( 1774 ई. - 1839 ई.)
आपने कटपयादि वर्ण कूटांक के प्रयोग द्वारा पाई का मान दशमलव के 17 स्थान तक याद रखने के लिए अपनी रचना "शाद्रत्नमाला" में वर्णन किया है -
भा ( 4) द्रा (2) म्बु (3) धी (9) सी ( 7)
दद्धा ( 9) जा ( 8) नम् (5) गा (3) नी ( 5)
ता ( 3) स्रा ( 2 ) दद्धा ( 9)  स्म ( 5) याद (1)
भू ( 4) पा (1) गीः (3)
पाई = 3. 14159265358979324
~भारती कृष्ण तीर्थ ( 1884 ई. - 1960 ई.)
गोवर्धन पीठ, पूरी के 143 वें शंकराचार्य जगत गुरु स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज जिनका जन्म 14 मार्च 1884 ई. को हुआ जिन्होंने वर्ण कूटांक का प्रयोग कर पाई  का  निकालने का सर्वाधिक सरल तथा रोचक श्लोक प्रस्तुत किया —
पाई /10 का मान :- वर्ण कूटांक का प्रयोग से पाई के 32 अंक तक के मान के लिए श्लोक।
।।  गोपीभाग्यमध्रुव्रात श्रंगिशोदधिसन्धिग।
3  1  4  1  5  9  2  6  5  3  5  8  9  7  9  3
      खलजिविताखाताव गलहालारसंधर।।
2  3  8  4  6  2  6  4  3  3  8  3  2  7  9  2
पाई /10 = 0.31415926535897932384626433832792
इस प्रकार पाई का 32 अंक तक प्राप्त करने के लिए यह श्लोक जिसका पहला पद भगवान् कृष्ण की स्तुति तथा दुसरा पद भगवान् शिव स्तुति एवं पूर्ण श्लोक गणितशास्त्र में पाई का मान सरलता से याद रखने का अद्भुत तरीका है।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि वैदिक काल से ले कर वर्तमान तक भारतीय गणितीय ज्ञान ने कई उतार-चढ़ाव, अनार्य आक्रांताओं के आत्याचार, कुछ आर्य गद्दारों की गद्दारी के संक्रमण से गुजरते हुए आज भी इतनी सम्पन्न है कि अनगिनत गणितज्ञ अपनी झोली के भारतीय गणितीय ज्ञान से भर सकती है, बस आवश्यकता है अपनी खाली झोली लेकर गणितीय ज्ञान का जिज्ञासु बनने की।
सधन्यवाद।
।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
(Person after Perfection becomes Personality)
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Blog :- ManasGanit.blogspot.co.in
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नोट :- उपरोक्त विषय व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है,
          अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों,
          ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा    
          अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया
          गया है।

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