Wednesday, 25 February 2026
Sunday, 22 February 2026
Vedic Ganit A Dance of Numbers
Vedic Ganit is not merely Mathematics — it is the Dance of Numbers.
In ordinary mathematics, numbers are counted.
In Vedic Ganit, numbers come alive.
They do not sit silently on paper;
they move, bend, expand, and dissolve —
like graceful dancers responding to rhythm.
The 16 Sutras are not just formulas.
They are choreographic principles of a cosmic performance.
Each Sutra gives numbers a new pose,
a new gesture,
a new expression:
Sometimes they leap to the answer in a single step.
Sometimes they turn inward, revealing symmetry.
Sometimes they mirror each other like dancers in perfect balance.
Sometimes they spiral, reducing complexity into elegance.
Calculation becomes creation.
Logic becomes rhythm.
Speed becomes grace.
Where modern methods march step-by-step,
Vedic Ganit flows —
effortless, intuitive, aesthetic.
It teaches us that Mathematics is not only to be solved…
it is to be experienced.
When the mind is still and attentive,
numbers begin to dance.
And the one who understands the Sutras
does not calculate —
he witnesses a performance of intelligence itself.
Monday, 16 September 2019
भारतीय गणितज्ञ - भास्कराचार्य (प्रथम)
भारतीय गणितज्ञ - भास्कराचार्य (प्रथम)
भारत के प्राचीन गणितज्ञ भास्कराचार्य (प्रथम) का जन्म महाराष्ट्र राज्य के परभानी जिला के बोरी गाँव में 570 ई. में हुआ था। भास्कराचार्य प्रथम को खगोलीय ज्ञान-विज्ञान का ज्ञान उन्हें अपने अपने पिता से विरासत में मिला और वे अपने आप को आर्यभट्ट का अनुयायी बताया। भास्कराचार्य (प्रथम) पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने छोटे से वृत को शून्य के रुप में निरूपित किया तथा हिन्दू दाशमिक प्रणाली में गणितीय ज्ञान को लिखना प्रारंभ किया। कूटांकन प्रणाली के द्वारा संख्याओं को अंको के स्थान पर शब्द व प्रतीक द्वारा गणित को कलात्मक रुप में समझाया।
जैसे शून्य के लिए आकाश, पूर्ण इत्यादि, संख्या 1 के लिए रुप, पृथ्वी, चन्द्रमा इत्यादि संख्या 2 के लिए जुड़वाँ, पंख, युगल, नेत्र, हाथ इत्यादि, संख्या 3 के लिए लोक, गुण, राम इत्यादि, संख्या 4 के लिए युग, वेद इत्यादि, संख्या पांच के लिए 5 ज्ञानेन्द्रियों, प्राण, वाण इत्यादि संख्या 6 के लिए रस, ऋतु इत्यादि, संख्या 7 के लिए स्वर, अश्व इत्यादि, संख्या 8 के लिए वसु, हाथी, सर्प इत्यादि संख्या 9 के लिए नन्द, अंक, छिद्र इत्यादि संख्या 10 के लिए पंक्ति, दिशा इत्यादि आदि के रूप में दर्शाया है।
भास्कराचार्य (प्रथम) ने महाभास्करीय, आर्यभटीय भाष्य एवं लघु भास्करीय नामक दो ग्रन्थ लिखे। बाद में इनका अरबी भाषा में भी अनुवाद किया गया।
भास्कराचार्य ने अपने ग्रंथ आर्यभटीय भाष्य में पाई के मान को 10 के वर्ग मूल के रुप में माना है जो आज के मान के लगभग सन्निकट है।
महाभास्करीय ग्रंथ में त्रिकोणमितिय फलन ज्या य (sin x) का मान निकालने का एक परिमेय व्यजंक दिया है यह सूत्र रोचक तथा सरल है जिससे Sin x का पर्याप्त शुद्ध मान प्राप्त होता है।
भास्कराचार्य प्रथम ने अभाज्य संख्या P के लिए एक संबंध 1+(p-1) दिया जो अभाज्य संख्या P से भाज्य है। बाद में अल-हथ्म (1000 ई.) फाइबोनेली ने भी इसे सत्यापित किया। आधुनिक गणित में इसे विलसन शेषफल प्रमेय (1770 ई.) के रूप में जानते हैं जिसे भास्कर प्रमेय के रूप में जानने की आवश्यकता है।
गणितज्ञ भास्कराचार्य प्रथम एक प्रमेय दिया जिसे आजकल पेल समीकरण 8x²-1=y² के रूप में कहते है।
वर्ग-प्रकृति (Nx² ± c = y²) के तैयार करने तथा हल करने का श्रेय अंग्रेज़ी गणितज्ञ जॉन पेल (1610 ई. - 1685 ई. ) को 1732 ई. में स्वीस गणितज्ञ लियोनार्दो यूलियर के द्वारा समीकरण का एक हल प्राप्त किया गया तथा समीकरण का श्रेय जॉन पेल को दिया गया।
परन्तु जाॅन पेल से काफी पहले भास्कराचार्य प्रथम ने एक प्रश्न खड़ा किया, कि वों संख्याएँ बताइए, जिसके वर्ग को 8 से गुणा कर एक जोड़ने पर दूसरी संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
जैसे 8x²-1=y² में x=1 एवं y=3 है, इसे सक्षेप में (x,y)= (1,3) लिखते है। इससे अन्य हल भी निकाले जा सकते है।
जैसे (x,y)=(6,17)
प्राचीन काल से ही भारत ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र रहा है ऐसे अनेक महान खगोलविद, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं गणितज्ञ हुए है जिनके निश्छल प्रयास तथा कल्याणकारी अनुसंधान ने आधुनिक संसार रचना के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है जो वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूल्य निधि है।
Tuesday, 10 September 2019
प्राचीन भारतीय गणितज्ञ - महावीराचार्य
महावीराचार्य दिगम्बर जैन शाखा के प्रमुख गणितज्ञ थे। इनका जन्म काल 9 वीं शताब्दी माना जाता है। इनका निवास स्थान कर्नाटक प्रांत में थ। राष्ट्रकूट वंश के राजा अमोघवर्ष (815-877 ई) के राज्य में महावीराचार्य रहते थे। इस काल (850 ई) में ही उन्होंने "गणित सार संग्रह" नामक ग्रंथ की रचना संस्कृत भाषा में की थी। गणित सार संग्रह में 9 अध्याय हैं तथा 1131 श्लोक हैं।
गणित-शास्त्र की प्रशंसा करते हुए महावीराचार्य कहते हैं कि
बहुभिर्विप्रलापैः किम् त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यत्किंचिद्वस्तु तत्सर्व गणितेन बिना न हि।।
अर्थात् गणित के बारे में बहुत क्या कहना, तीनो लोकों में सचराचर (चेतन और जड़) जगत में जो भी वस्तु विद्यमान हैं वे सभी गणित के बिना संभव नहीं हैं।
महावीराचार्य का योगदान
छेदापर्वकानां लब्धनां चाहतौ निरुद्ध स्यात्।
हरहृत निरुद्धगुणिते हारांशगुणे समो हारः।।
(गणित सार संग्रह, अध्याय - 3 श्लोक)
एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वधरतिः पदमूर्ध्वधरतिः क्रमोत्क्रमशः ।
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम् ।।
अर्थात्
संचयो की संख्या =
[n (n-1) (n-2) (n-3)... (n-r+1)]/ [1×2×3×....×r]
जहाँ n वस्तुओं की संख्या तथा r जितनी वस्तुएं लेकर संचय बनाना है उनकी संख्या।
(a + b + c +...... m + n)² = a² + b² + c² +..... +n² +2ab + 2bc + 2cd + .... +2mn)
(a + b + c +...... m + n)³ = a³ +3a²b ( b + c +.... + n) + 3a (b + c +....... + n)² + ( b + c +.... + n)³
यद्यत्क्षेत्रं जातं बीजैस्संस्थाप्यं तस्य कर्णेन ।
इष्टं कर्णं विभाजेल्लाभगुणा कोटिदोः कर्णः ।।
आधुनिक गणित के इतिहास में इस प्रकार के त्रिभुज की रचना के संबंध में नियोनार्दो फिबोमासी (1202 ई.) ने पहली बार विचार किया है।
धनं धनर्णयोर्वर्गों मूले स्वर्णे तयोः क्रमात्।
ऋणं स्वरुपतोऽवर्गोयतस्यस्मान्न तत्पदम्।।
(अ - 7 श्लोक - 122)
अर्थात्
किसी भी संख्या का वर्गमूल धनात्मक होता है। ऋणात्मक संख्या स्वभाविकतः किसी संख्या का वर्ग नहीं होता क्योंकि इसका वर्गमूल निकालना संभव नहीं है।
Wednesday, 20 March 2019
प्राचीन भारतीय गणितज्ञ - ब्रह्मगुप्त
ब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ई अर्थात् 520 शक संवत् (541 वि. सं.) में हुआ था। इनका जन्म स्थान भिनमाल, माउण्ट आबू , राजस्थान में हैं। यह गुजरात सीमा से लगा हुआ है। ब्रह्मगुप्त उज्जैन गुरुकुल के प्रमुख खगोल शास्त्री थे। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में 628 ई में "ब्रह्मस्फूट-सिद्धांत" नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। ब्रह्मस्फूट-सिद्धांत भारतीय खगोल शास्त्र का प्रामाणिक एवं मानक ग्रंथ है। इस ग्रंथ में 24 अध्याय हैं। 12वें अध्याय को गणिताध्याय नाम दिया है, अर्थात इसमें अंक गणित (arithmetic) तथा छाया गणित आदि पर सामग्री दी गई है। 18 वें अध्याय को कुट्टकाध्याय नाम दिया है। इसमें बीजगणित (algebra) अनिर्धार्य रैखिक एवं वर्ग समीकरण के हल दिये हैं। इसके अध्याय - 2 में त्रिकोणमिति (trigonometry) पर कार्य किया गया है।
इस ग्रंथ के अलावा इनका "खण्डखाद्यकम्" नामक करण ग्रंथ उपलब्ध है। इसमें विशेषकर अंतर्वेशन (Interpolation) तथा समतल त्रिकोणमिति (Plane Trigonometry) एवं गोलीय त्रिकोणमिति (Spherical Trigonometry) दोनों में sine (ज्या) और cosine (कोटिज्या) के नियम उपलब्ध हैं। उपर्युक्त दोनों ग्रंथ भांडारकर प्राच्य विद्या संशोधन मंदिर, पुणे, महाराष्ट्र में देखें जा सकते हैं। ब्रह्मगुप्त के इन ग्रन्थों के अरबी और फारसी भाषा के अनुवाद के माध्यम से भारत का यह गणित एवं खगोल विज्ञान का ज्ञान अरब तथा बाद में पश्चिम के देशों को प्राप्त हुआ।
1. वर्गमूल तथा घनमूल ज्ञात करने की सरल विधियां दी हैं।
2. शून्य के गुणधर्म की व्याख्या की है।
3. वर्ग-समीकरण के मूल ज्ञात करने की विधि ब्रह्मगुप्त ने दी है, जो इस प्रकार है :
वर्गचतुर्गुणितानं रूपाणां मध्य वर्ग सहितानाम।
मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोधृतं मध्यः ।।
(ब्रह्मस्फूट-सिद्धांत अ 12, श्लोक 44)
तब X² = (b² - 4ac) / 2a
स्थूलफलं त्रिचतुर्भूजबाहु प्रतिबाहु योग दसघातः।
भुजयोगार्धचतुष्टय भुजोनघातात पदं सूक्ष्मम।।
(चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल)² = (s-a) (s-b) (s-c) (s-d)
जहाँ a, b, c एवं d चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएं हैं तथा
S = (a+b+c+d) / 2 है ।
तथा S = (a+b+c) / 2
(त्रिभुज का क्षेत्रफल)²= s(s-a) (s-b) (s-c)
कर्णाश्रित भुज घातैक्यमुभयथान्योन्यभाजितं गुणयेत।
योगेन भुजप्रति भुजवधयोः कर्णौ पदे विषमे ।।
(कर्ण - 1)²={(ad+bc)/(ab+cd)} × (ac+bd)
(कर्ण - 2)²= {(ad+cd) /(ad+bc)} × (ac+bd)
Tuesday, 22 January 2019
परिचय (Introduction) - भारतीय विज्ञान परंपरा (Bhartiya Vigyan Prampara)
।। भारतीय विज्ञान परंपरा।।
भारतवर्ष में वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन-अनुसंधान की परंपरा वैदिक काल से है। अनेकों ऋषि-मुनियों तथा मनीषियों ने इसके लिए अपने अमूल्य जीवन का सर्वस्व अर्पित किया है। भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, अत्रि, गर्ग, शौनक, नारद, चक्रायण, अगस्त्य आदि प्रमुख हुए जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया।
उदाहरण के लिए महाऋषि भृगु अपने शिल्प शास्त्र में शिल्पा की परिभाषा करते हुए जो लिखते हैं उससे ज्ञान की परिधि कितनी व्यापक थी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है —
नानाविधानं वस्तुनां यंत्राणाँ कल्पसंपदा
धातुनां साधनानां च वस्तुनां शिल्पसंज्ञितम् ।
कृषिर्जलं खनिश्चेति धातुखण्डं त्रिधाभिधम् ।।
नौका-रथाग्नियानानां, कृतिसाधनमुच्यते।
वेश्म, प्रकार, नगररचना वास्तु संज्ञितम्।।
- भृगु संहिता
अर्थात् —
भृगु दस शास्त्र का उल्लेख करते हैं — कृषि शास्त्र, जल शास्त्र, खनि शास्त्र, नौका शास्त्र, रथ शास्त्र, अग्नियान शास्त्र, वेश्म शास्त्र, प्रकार शास्त्र, नगर रचना, यंत्र शास्त्र। इसके अतिरिक्त 32 प्रकार की विद्याएं तथा 64 प्रकार की कलाओं का उल्लेख आता है। इसकी विषय-सूची देखकर लगता है कि इनकी परिधि संपूर्ण जीवन में व्याप्त करने वाली थी। इन विद्याओं के अनेक ग्रंथ थे, कितने ही लुप्त हो गये। कई विद्याएं, जानने वाले के साथ ही लुप्त हो गई क्योंकि हमारे यहाँ एक मान्यता रही है कि अयोग्य पात्र के हाथ विद्या नहीं जानी चाहिए। यद्यपि यह सत्य है कि बहुत सा ज्ञान लुप्त हो चुका है, परन्तु आज भी लाखों पांडुलिपियाँ बिखरी पड़ी है। आवश्यकता है उनके अध्ययन, विश्लेषण और प्रयोग की। इस प्रक्रिया से शायद ज्ञान के नये क्षेत्र उद्घाटित हो सकते हैं। अतः प्रयास किया गया है कि विषय प्रेमी की रुचि भारतीय विरासत को समझे एवं नई सोच के साथ भावि पीढ़ी को हस्तांतरित करे।
Sunday, 20 January 2019
नारायण पंडित (Narayana Pandit)
।। भारतीय गणितज्ञ-नारायण पंडित (01) ।।
केरला के महान गणितज्ञ जिनका कार्यकाल 1325 ई. से 1400 ई. के बीच रहा। इनके पिता का नाम नरसिम्हा था। आर्यभट्ट तथा भास्कराचार्य - ।। से प्रभावित हो कर गणित के विभिन्न क्षेत्रों में अनुपम योगदान दिया, इन्होंने अंकगणित, बीज-गणित, ज्यामिती, जादूई-वर्ग इत्यादि अनेक विषयों पर कार्य किया है। सन् 1356 ई. में इन्होंने गणित कौमुदी की रचना की साथ ही भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा रचित लीलावती के उपर टिप्पणी 'कर्मप्रदीपिका' की रचना की।
विभिन्न क्षेत्रों में आपके द्वारा किये गये कुछ कार्य —
~ अंकगणित —
इसके अन्तर्गत आपने वर्ग करने की नई विधि की रचना की थी
(i) P² = (p + q)² = p² + q² + 2pq
(24)² = (20 + 4)²
= 20² + 4² + 2×20 × 4
= 400 + 16 + 160
= 576
(ii) N² = (N - a) (N+ a) + a²
(24)² = ( 24 - 4) ( 24+ 4) + 4²
= 20 × 28 + 16
= 576
इसके अलावा गुणन के प्रक्रिया को कपाट-संधि विधि से बताया।
उन्होंने 10 के वर्ग मूल के लिए 3 जोड़ी हल दिये जहाँ x तथा y है (6, 19), (228, 721) तथा (8658, 27379) जो कि 10 के वर्ग मूल का कई अंकों तथा शुद्ध मान देता है —
(1) 10 का वर्ग मूल = 19 / 6 = 3.16667
(2) 10 का वर्ग मूल = 721 / 228 = 3.1622807
(3) 10 का वर्ग मूल = 27379 / 8658 = 3.162277662 (दशमलव के आठ अंकों तक)
~ बीज-गणित —
- आर्यभट्ट की कुट्टक प्रक्रिया पर विस्तार से कार्य किया।
- भास्कराचार्य - ii के चक्रवाल पद्धति Nx² + 1 = y² पर भी विस्तृत चर्चा की
उन्होंने इसके कई हल दिये —
~ 97x² + 1 = y² : इसका हल x = 6377352 तथा y = 63809633
~ 103x² + 1 = y² : इसका हल x = 2249 तथा y = 227528
- नारायण पंडित की गुणनखण्डन प्रक्रिया जोकि आजकल हम फरमेट गुणनखण्डन विधि के नाम से जानते हैं।
~ ज्यामिती —
इस विषय के अन्तर्गत आपने कई विषयों पर कार्य किया है।
चक्रीय चतुर्भुज :-
(1) यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएं दी गई हो तो उसके केवल तीन विकर्ण संभव है।
(2) किसी चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल उसके तीनों विकर्णों के योग को त्रिज्या के चार गुणा से विभाजित कर प्राप्त किया जा सकता है या तीनों विकर्णों को परिवृत के व्यास के दो गुणा से विभाजित कर प्रात किया जा सकता है।
(3) उन्होंने चक्रीय चतुर्भुज के परिवृत त्रिज्या प्रात करने के लिए भी सूत्र दिए हैं।
त्रिभुज का क्षेत्रफल :-
त्रिभुज का क्षेत्रफल प्राप्त करने के लिए उन्होंने यह सूत्र दिया —
त्रिभुज के भुजाओं के योग को त्रिभुज के परिवृत त्रिज्या के चार गुणा से विभाजित करने से प्राप्त होता है।
अंकपाश, मत्स्य मेरु, इत्यादि विषयों पर कार्य किया है।
~ जादूई-वर्ग —
इस विषय पर आपने
पद्मा हर छोटे वर्ग के चार पत्रों में 8 संख्या इस प्रकार रखें कि कुल योग 132 हो ,
वाजरा में 8 संख्या को एक ही काॅलम में प्रत्येक वर्ग ऊर्ध विकर्ण में इस प्रकार रखें कि योग 132 हो,
शादसरा (षट्भुज) हर समूह में 8 संख्या इस प्रकार है कि कुल योग 294 है।
इस तरह की अनेक जादूई-वर्ग का निर्माण बहुत ही सुन्दरता से आपने "भद्र-गणित" में किया है।
आपके द्वारा तैयार किया गया एल्गोरिदम का प्रयोग गणित के साथ साथ कम्प्यूटर के प्रोग्रामिंग लैंग्वेज C, C++ में किया जाता है।
।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
(Person after Perfection becomes Personality)
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नोट :- उपरोक्त विषय व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है,
अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों,
ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा
अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया
गया है।