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Sunday, 21 October 2018

।। खगोल शास्त्र - प्रकाश की गति (Astronomy - Speed of light)

 October 21, 2018     भारतीय विज्ञान   

।। खगोल शास्त्र।।
खगोल विज्ञान को वेद का नेत्र कहा गया क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टियों में होने वाले व्यवहार का निर्धारण काल से होता है और काल का ज्ञान ग्रहीय गति से होता है। अतः खगोल विज्ञान वेदाङ्ग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रंथों में नक्षत्र, चन्द्रमास, सौरमास, मलमास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प की माप, आदि के संदर्भ में अनेक उदाहरण मिलते हैं।

प्रकाश की गति :-
ऋग्वेद के प्रथम मंडल में दो ऋचाएं हैं —
मनो न योऽध्वनः सद्य एत्येकः सत्रा सूरो वस्व ईशे ।
                                                  - ऋग्वेद 1. 79. 9
अर्थात् —
मन की तरह शीघ्रगामी जो सूर्य स्वर्गीय पथ पर अकेले चले जाते हैं।
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य ।
विश्वमा भासि रोचनम् ॥
                           - ऋग्वेद  1. 50 .9
अर्थात् हे सूर्य, तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो।
उपरोक्त श्लोक पर टिप्पणी /भाष्य करते हुए महर्षि सायणाचार्य ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया -

योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने।
एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥
                            -सायण ऋग्वेद भाष्य 1. 50 .4

अर्थात्—
आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है|

योजन एवं निमिष प्राचीन समय में क्रमशः दूरी और समय की इकाई हैं|उपर्युक्त श्लोक से हमें प्रकाश के आधे निमिष में 2202 योजन चलने का पता चलता है अब समय की ईकाई निमिष तथा दूरी की ईकाई योजन को आधुनिक ईकाइयों में परिवर्तित कर सकते है ।
1 योजन = 9 मील 160 गज
1 दिन रात में 810000 अर्ध निमेष
1 सेकेंड में 9.41 अर्ध निमेष
इस प्रकार 2202 × 9.11 = 20060.22 मील /अर्ध निमेष
20060. 22 × 9.41 = 188766.67 मील /सेकेंड
यह मान आधुनिक मान 186000 मील /सेकंड के लगभग बराबर है

गुरुत्वाकर्षण :-
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)
मिथक:-
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)  की खोज का श्रेय सर आइजक न्यूटन (1666 AD) को दिया है।
सत्यता:-
सर आइजक न्यूटन से लगभग हजारों वर्ष पूर्व ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force) पर कई  ग्रन्थों रचना हो गई थी।

(1)
यह ऋग्वेद के मन्त्र हैं :-
यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे ।
आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ।।
                     ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ३ )
अर्थात :-
सब लोकों का सूर्य्य के साथ आकर्षण और सूर्य्य आदि लोकों का परमेश्वर के साथ आकर्षण है । इन्द्र जो वायु , इसमें ईश्वर के रचे आकर्षण, प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं । उनसे सब लोकों का दिन दिन और क्षण क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर उधर विचल भी नहीं सकते ।
यदा सूर्य्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः ।
आदित्ते विश्वा भुवनानी येमिरे ।।३।।
                       ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ५ )
अर्थात :- हे परमेश्वर ! जब उन सूर्य्यादि लोकों को आपने रचा और आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने सामर्थ्य से उनका धारण कर रहे हैं , इसी कारण सूर्य्य और पृथिवी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे हैं । इन सूर्य्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है

(2)
ऋषि पिप्पलाद ( लगभग ६००० वर्ष पूर्व ) ने प्रश्न उपनिषद् में कहा :-
पायूपस्थे – अपानम् ।
                              ( प्रश्न उप० ३.४ )
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य० ।
                                            ( प्रश्न उप० ३.८ )
तथा पृथिव्याम् अभिमानिनी या देवता,
सैषा पुरुषस्य अपानवृत्तिम् आकृष्,
अपकर्षेन अनुग्रहं कुर्वती वर्तते ।
अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाशे वा उद्गच्छेत् । 
                                  (शांकर भाष्य, प्रश्न० ३.८ )
अर्थात :- अपान वायु के द्वारा ही मल मूत्र नीचे आता है । पृथिवी अपने आकर्षण शक्ति के द्वारा ही मनुष्य को रोके हुए है, अन्यथा वह आकाश में उड़ जाता ।

(3)
वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा :-
पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः ।
खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।  
                                                        (पंच०पृ०३१ )
अर्थात :- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथिवी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।

(4)
महर्षि पतञ्जली (150 ई० पूर्व) व्याकरण महाभाष्य में भी गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा :-
लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारोहति ।
पृथिवीविकारः पृथिवीमेव गच्छति आन्तर्यतः ।।  
           (महाभाष्य :- स्थानेन्तरतमः,१/१/४९ सूत्र पर )
अर्थात् :- पृथिवी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है । वह पृथिवी का विकार है, इसलिये पृथिवी पर ही आ जाता है ।

(5)
आचार्य श्रीपति ने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में कहा है :-
उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।
                                                                              ( सिद्धान्त० १५/२१ )
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।। ( सिद्धान्त० १५/२२ )
अर्थात :- पृथिवी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथिवी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।
(6)
भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इनका जन्म 1114 ई. में हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे। यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। जब इन्होंने "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक ग्रन्थ लिखा तब वें मात्र 36 वर्ष के थे। "सिद्धान्त शिरोमणि" एक विशाल ग्रन्थ है।
जिसके चार भाग हैं
(1) लीलावती (2) बीजगणित (3) गोलाध्याय और (4) ग्रह गणिताध्याय।
लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। अपनी पुत्री के नाम पर ही उन्होंने पुस्तक का नाम लीलावती रखा। यह पुस्तक पिता-पुत्री संवाद के रूप में लिखी गयी है लीलावती में बड़े ही सरल (simple) और काव्यात्मक (poetic) तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है—
"आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं,
                             गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति,
                           समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।"
                                       (~ सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश)
अर्थात्—
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति ( Attractions force of the earth) है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

सुझाव:-
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम को भास्कराचार्य गुरुत्वाकर्षण नियम कहना उचित होगा, यह वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा का परिचायक होगा।

विभिन्ना ग्रहों की दूरी :-
हमारे सौरमंडल में 8 ग्रह है, आर्यभट्ट ने सूर्य से विभिन्न ग्रहों की दूरी के बारे में बताया है। वह आज के माप के काफी मिलता जुलता है। आज के माप के अनुसार पृथ्वी से सूर्य के बीच की दूरी 15 करोड़ किमी. है इसे खगोलीय इकाई (Astronomical Unit / A U) कहा जाता है।
ग्रह             आर्यभट्ट के मान             वर्तमान मान
बुध              0.375 AU                    0.387 AU
शुक्र             0.725 AU                    0.723 AU
मंगल           1.538 AU                    1.523 AU
गुरु               5.16 AU                       5.20 AU
शनि              9.41 AU                       9.54 AU

सूर्योदय - सूर्यास्त :-
पृथ्वी गोलाकार होने के कारण विविध नगरों में रेखांकित होने के कारण अलग अलग स्थानों में अलग अलग समय पर सूर्योदय व सूर्यास्त होते हैं इसे आर्यभट्ट ने ज्ञात कर लिया था, वे लिखते हैं —
उदयो यो लंकायां सोस्तमयः सवितुरेव सिद्धपुरे।
मध्याह्नो यवकोट्यां रोमक विषयेऽर्धरात्रः स्यात् ।।
                                      - आर्यभटीय गोलपाद - 13
अर्थात् —
जब लंका में सूर्योदय होता है, तब सिद्धपुर में सूर्यास्त हो जाता है। तब यवकोटि में मध्याह्न तथा रोमक प्रदेश में अर्धरात्रि होती है।
इस प्रकार इस संक्षिप्त अवलोकन से हम कह सकते हैं कि काल गणना और खगोल विज्ञान की भारत में उज्ज्वल परंपरा रही है। पिछले कुछ सदियों में यह धारा कुछ अवरुद्ध सी हो गई थी। आज पुनः उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा पूर्वकाल के आचार्य आज की पीढ़ी को दे रहे हैं।

। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
(Person after Perfection becomes Personality)
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नोट :- उपरोक्त विषय व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों, ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया है।

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