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Monday, 27 June 2016

।। अनेक-वर्ण-समीकरण।।

 June 27, 2016     No comments   

।। अनेक-वर्ण-समीकरण ( Multiple-Variable-Equestions) ।।

या
दो चर वाले रैखिक समीकरण ( Linear Equation of two Variable)

प्राचीन (Ancient) बीज-गणित (Algebra) में अनेक चर वाले समीकरणों (equestrians) का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। इनमें से कुछ समीकरणों को ब्रह्मगुप्त ने संक्रमण (transition) या विषम-कर्म नाम प्रदान किया गया है। यदि दो चर (variable) या अज्ञात राशि हो तथा उनके हल करने के लिए दो समीकरण का उपयोग हो तो निश्चित हल प्राप्त होता है।

—संक्रमण के नियम (Rules of Transition) :-
इस नियम के द्वारा दो चर वाली राशि के मान का संक्रमण एक चर के मान में कर दिया जाता है। इस प्रकार इसका यह नाम सार्थक है। प्राचीन बीज-गणित में इसके छोटे-छोटे उपभेदों को रखते हुए उनके अलग-अलग प्रकार के नियम बताए हैं। यहाँ इनका क्रमशः निरूपण इस प्रकार प्रस्तुत है।

—संक्रमण के प्रकार (Types of transition) :-

प्रथम :-
महावीराचार्य के विवरण (description) के अनुसार एक विशेष (special) प्रकार (type) के संक्रमण में समीकरण का यह आकार प्राप्त होता है —
  c X  +  d Y  =  a   
  d  X  +  c Y  =  b

इसे हल करने के लिए उनके द्वारा प्रस्तुत नियम यह है कि —
ज्येष्ठघ्नमहाराशेजघन्यफलताडितोनमपनीय।
फलवर्गशेषभागो ज्येष्ठार्धोsन्यो गुणस्य विपरीतम् ।।
                        (—गणितसार-संग्रह - 5 - 139)
अर्थात :-
बड़ी राशि (d) की बड़ी गुणित (coefficient) राशि (b) से गुणा (multiply) करने पर प्राप्त संख्या से छोटी राशि (c) की छोटी गुणित (coefficient) राशि (a) को घटाकर प्राप्त संख्या को तथा बड़ी राशि (d) की छोटी गुणित (coefficient) राशि (a) से गुणा करने पर प्राप्त संख्या से छोटी राशि (c) की बड़ी गुणित (coefficient) राशि (b) को घटाकर प्राप्त संख्या को बड़ी संख्या के वर्ग (square) (d²) से छोटी संख्या के वर्ग (square) (c²) को घटाने पर प्राप्त संख्या से भाग (divide) देने पर क्रमशः अज्ञात अभिमत (required) राशि प्राप्त होती है।

इस नियम के अनुसार (X) तथा (Y) का मान ज्ञात करने के लिए यह सूत्र प्राप्त करते हैं —
X = (db - ca) ÷ (d² - c²)
Y = (da - cb) ÷  (d² - c²)

उदाहरण (example) :-
5x + 7y = 101,  { c = 5, d= 7, a= 101 }
7x + 5y  = 103, { d=7, c=5, b= 103 }
इस सूत्र के प्रयोग से इसका मान सर्वथा स्पष्ट है —
X = ( 7 × 103 - 5 × 101) ÷ ( 49 - 25)
    = ( 721 - 505)  ÷ 24
    = 216 ÷ 24
    = 9
Y = (7×101 - 5×103) ÷ (49-25)
   = ( 707 - 515) ÷ 24
   = 192 ÷ 24
   = 8

अभ्यास (Exercise) :-
(1)  a X  + b Y  =  a  ; b X   +  a Y  = b
(2) 31 X  + 23 Y  = 39 ; 23 X + 31 Y  = 15
(3)148X + 231Y = 527 ; 231X+148Y =610

द्वितीय :-
संक्रमण के अन्य प्रकार में इस प्रकार का समीकरण प्राप्त होता है —
X + Y  = a
X  -  Y  = b

ब्रह्मगुप्त ने इसे हल करने के लिए नियम इस प्रकार बताया है —
योगोsन्तरयुतहीनो द्विहृतः संक्रमणन्तरविभक्तं वा।
                      (—ब्रह्मस्फुट-सिद्धांत - 18 - 36)
अर्थात :-
दो चर संख्याओं के योग (sum) तथा अन्तर (difference) से प्राप्त अचर संख्या को युत अर्थात जोड़ कर अथवा घटाकर दो से विभाजित (divide) करे। इस संक्रमण से अज्ञात राशि का मान प्राप्त होता है।

भास्कराचार्य ने इस विधि को इन शब्दों में प्रकट किया है —
योगोsन्तरेणोनयुतोsर्धितस्तौ राशि स्मृतं संक्रमणाख्यमेतत्।
              (—लीलावती, संक्रमण विधि, श्लोक - 1)
अर्थात :-
योगांक (a) तथा अन्तरांक (b) को क्रमशः घटाकर तथा जोड़कर आधा (half) करने से संक्रमण नामक राशियां प्राप्त होती है।
इसके अनुसार हम संक्रमण में X तथा Y का मान प्राप्त करने के लिए यह सूत्र प्राप्त करते हैं।
X  = 1/2 ( a+b)
Y = 1/2 (a - b)

उदाहरण (example) :-
X + Y  =  101
X  -  Y  =  25
उपरोक्त सूत्र का प्रयोग कर इस प्रकार हल प्राप्त किया जा सकता है —
X =  (101 + 25) ÷  2  = 126 ÷ 2 = 63
Y =  ( 101 -  25)  ÷ 2  = 76 ÷ 2  = 38

अभ्यास (exercise) :-
(1) x + y = 407 ; x -  y  = 67
(2) x + y = 351 ; x -  y  = 51

तृतीय :-
गणित सार-संग्रह में इसके एक अन्य प्रकार का उल्लेख किया गया है। इसके समीकरण का यह आकार होता है —
X² + Y² = a
      XY  = b
इसके लिए प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक महावीराचार्य का नियम यह है कि अज्ञात राशि के वर्ग योगांक (a) में द्विगुणित अवर्ग योगांक (b) जोड़े या उसमें से इसे घटावें। इन दोनों का वर्गमूल (square root) प्राप्त करें। पुनः इन वर्गमूलित राशियों को जोड़कर या घटाकर दो से भाग देने पर अज्ञात राशि का मान प्राप्त होता है।

इसके अनुसार ऐसे समीकरणों के लिए सूत्र प्राप्त होता है —
X = ½ { ( a + 2b) ½  +  ( a -  2b) ½}
Y = ½ { ( a + 2b) ½ + ( a - 2b) ½}

उदाहरण (example) :-
X² + Y² = 1282
      XY = 609
X = ½ { ( 1282 + 2× 609) ½ + (1282 - 2×609) ½}
  = ½ { (1282 + 1218) ½ + (1282- 1218) ½}
= ½ { (2500)½ + (64)½}
= ½ ( 50 + 8)
= ½ × 58
= 29
Y = ½ × (50 - 8)
   =  ½ × 42
  = 21

चतुर्थ :-
विषम-कर्म  :-  इसके अन्तर्गत प्रायः दो चर वाले ऐसे समीकरणों का वर्णन है, जिन्हें सामान्य विधि से या प्रतिस्थापन विधि (Elimination method) से एक चर में बदल कर उसके मान को प्राप्त किया जा सकता है अथवा इन्हें द्विघात-समीकरण (Quadratic Education) के आकार में परिवर्तित करके सूत्र द्वारा उसका मान जाना जा सकता है।

   इसके एक प्रकार के अन्तर्गत अज्ञात वर्ग संख्या तथा अवर्ग संख्या के व्यकलन के आधार पर इस प्रकार के समीकरण बनते हैं —
X² - Y² = a
X -  Y = b
ब्रह्मगुप्त ने इसे हल करने का नियम इस प्रकार बताया है —
वर्गान्तरमन्तरयुतहीनं द्विहृतं विषम-कर्म ।
                             (— ब्रह्मस्फूट-सिद्धांत - 18- 36)
अर्थात :-
अज्ञात राशि के वर्ग के अन्तर (a) को (अवर्ग राशि के अन्तर (b) से भाग देवे तथा भागफल को) उस अज्ञात राशि के अन्तर (b) जोड़े या घटावें। पश्चात् 2 से भाग देवे। इसका भागफल (Quotient)ही अज्ञात राशि है। इसे विषम-कर्म कहते हैं।

इस नियम में ब्रह्मगुप्त से भी ज्यादा स्पष्ट उल्लेख भास्कराचार्य ने बिना विषम-कर्म का नाम लेते हुए किया है —
वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तं योगस्ततः प्रोक्तवदेव राशि।
                        (—लीलावती, संक्रमण-सूत्र - 1)
अर्थात :-
वर्गान्तर (a) को अज्ञात राश्यांतर (b) से भाग देने पर दोनों राशियों का योग ज्ञात होता है। उसके पश्चात पूर्वोक्त संक्रमण विधि से अज्ञात राशि का प्रतिज्ञान होता है।
इन दोनों संक्रियाओं को मिलाने से हमें यह सूत्र प्राप्त होता है —
X = ½ ( a/b + b),
Y  = ½ ( a/b - b)

अभ्यास :-
(1) X² -  Y²  = 400  ;  X -  Y  = 8
(2)  X² - Y²  = 800  ;  X  -  Y  = 16

पंचम :-
विषम-कर्म के अन्य प्रकार के अन्तर्गत एक समीकरण में अज्ञात वर्ग राशियों का तथा दूसरे में अवर्ग राशियों का योग प्रस्तुत किया जाता है ऐसे प्रश्नों में इस प्रकार समीकरण निकाय बनता है। —
X²  +  Y²  = a
X  +  Y  =  b
इसके लिए ब्रह्मगुप्त के द्वारा प्रस्तुत नियम इस प्रकार है —
कृति-संयोगाद् द्विगुणद्युतिवर्गं प्रोह्य शेषमूलं यत् ।
तेन युतोनो योगो दलितः शेषे पृथगभीष्टे ।।
                                      (—ब्रह्मस्फूट-सिद्धांत)
अर्थात :-
द्विगुणित वर्ग योगांक (a) से अवर्ग योगांक (b) के वर्ग को घटाकर प्राप्त संख्या के वर्गमूल को अवर्ग योगांक (b) से जोड़े या घटाए। प्राप्त राशि को 2 से भाग देने पर अभीष्ट राशियाँ प्राप्त होती है।

इस नियम के अनुसार यह सूत्र प्राप्त होता है —
X = ½ { b + (2a - b²) ½}
Y = ½ { b -  ( 2a - b²) ½}

अभ्यास :-
(1) X² + Y² = 1282 ; X + Y = 50

दो चर वाले समीकरण में भास्कराचार्य के नियम अधिक स्पष्ट है —
आद्यं वर्णं शोधयेदन्यपक्षादन्यान् रूपण्यन्तश्चद्यभक्ते ।
पदेsन्यस्मिन्नाद्यवर्णोन्मितिः स्यात् वर्णस्यैकस्योन्मितीनां बहुत्वे ।।
समीकृतच्छेदगमे तु ताभ्यास्तदन्यवर्णोन्मितयः प्रसाध्याः।
अन्त्योन्मितौ कुट्टविधेर्गुणाप्ती ते भाज्यतद्भाजकवर्णमाने ।।
(—भास्करीय बीज-गणित, अनेक-वर्ण-समीकरण, श्लोक -  1 - 2)
अर्थात :-
इसके लिए समीकरण में 'आदिम वर्ण' अर्थात पहली चर राशि का इस प्रकार शोधन करें कि एक तरफ अाद्य वर्ण तथा दूसरी ओर रूप अर्थात व्यक्त या अचर राशि तथा आद्य वर्ण से संबंधित दूसरी चर राशि रह जावे।
वर्ण या चर राशि के (दो समीकरण में) दो उन्मिति या मान प्राप्त होने पर तो समीकरण की सामान्य संक्रियाओं को करने पर अन्य पक्ष में आद्य वर्ण या पहली चर राशि का मान तथा (प्रतिस्थापन विधि से) अन्य वर्ण या दूसरी चर राशि का मान प्राप्त होगा।

अभ्यास :-
(1) X -  2Y = - 300 ; 6X -  Y  = 70
(2) X + Y  = 7 ; 5X + 12Y = 7
(3) X + Y  = 3  ; 2X  +  5Y = 12
(4) 2x + 4y = 10 ; 2x -  2y = 2

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।। देश को बदलना है तो शिक्षा को बदलना होगा।।

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Wednesday, 22 June 2016

।। शून्य।।

 June 22, 2016     No comments   

।। शून्य।।

पूर्णता में शून्य है, शून्यता में पूर्ण है।
पूर्णता ही शून्य है, शून्यता ही पूर्ण है।
पूर्ण करके शून्यता को, शून्यता का भाव है।
शून्य करके पूर्णता को, पूर्णता का भाव है।
भाव का आभाव है, तब पूर्ण-शून्य सम-भाव है।
   
वेदों में शून्य का प्रयोग उपलब्धता को प्रमाणित करने के लिए सर्वप्रथम ऋग्वेद के आठवें मंडल के सतहत्तरवें सुक्त के तीसरे श्लोक से प्राप्त होता है जिसके अनुसार " आकाश या अवकाश से परिपूर्ण गोल छिद्र के लिए  "ख"  का प्रयोग प्राप्त है। "

खे अराँ इवा खेदया
                       (ऋग्वेद — 8 / 77 / 3)
पुनः अथर्ववेद में चौदहवें मंडल के प्रथम तथा द्वितीय श्लोक में किसी भी अनुपलब्ध वस्तु को चाहने वाले के लिए "शून्यैषी"  का प्रयोग किया गया है तथा उन्नीसवें मंडल के बाइसवें श्लोक में भी शून्य की उपलब्धता प्रमाणित होती है
शून्यैषी निर्ऋते याजगन्धोत्तिष्ठराते प्रपत मेह रंस्थाः।
                    ( अथर्ववेद  — 14  /  2 / 19 )
ॐ क्षुद्रेभ्यः स्वाहा।।
                   ( अथर्ववेद   — 19  /22   / 6)
खे रवस्य खे खेअनसः युगस्य शतफलो ।
                     ( अथर्ववेद  —14 / 1  / 41)
यजुर्वेद में...
ॐ खं ब्रह्म...  
               ( अध्याय  40 / 17)
अर्थात :-
प्रणवाक्षर ॐ एवं ख दोनों ही ब्रह्म वाचक हैं....
ख का अर्थ अंतरिक्ष एवं शून्य होता है। जिसमें  भी अभाव या खाली के अर्थ में  इस शब्द का प्रयोग किया गया है।
महाभारत के बाद नागार्जुन :-
महान दार्शनिक नागार्जुन ने बौद्ध दर्शन के शून्यवाद नामक संप्रदाय में एक विशेष परिभाषिक अर्थ में इसका प्रयोग हुआ —
शून्यता सर्वदृष्टीनां प्रोक्ता निस्सरणं जिनैः ।
                             (  मध्यमक  शास्त्र   13 / 8)
अर्थात :-
शून्यता को सभी दृष्टियों में सर्वश्रेष्ठ बताया है।

भारत के सर्वप्रथम तथा सर्वश्रेष्ठ पाणिनी के व्याकरण के अनुसार यह शब्द सूजने अर्थ वाली श्वि धातु से भूतकाल में क्त प्रत्यय होकर निर्मित होता है। वास्तव में उस अण्ड के इस सूजे हुए खाली स्थान का नाम ही शून्य अथवा आकाश है।
तत्पश्चात उपनिषद जो कि साहित्य-शास्त्र में भारत तथा भारतीयता का अद्भुत दर्शन प्राप्त है में शून्य के लिए एक सुन्दर मंत्र —
ॐपूर्णमद पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                    —( बृहदारण्यक उपनिषद  5 / 1 / 1)
                    —(इशावास्योपनिषद )
अर्थात :-
—यह एक ऐसा पूर्ण है जिससे पूर्ण में से निकाल लेने पर भी पूर्ण ही बच जाता है।
—उपरोक्त शांति मंत्र मात्र अध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणितशास्त्र  का आधार बना।
जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है।  शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनंत की भी है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के एक रोचक श्लोक में दोनों अर्थों वाले शून्य का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है —
यत्तद् ब्रह्म परं सूक्षम् अशून्यम् शून्यकल्पितम् ।
अर्थात :-
वह परम सूक्ष्म ब्रह्म शून्य नहीं है, फिर भी शून्य के रुप में प्रकल्पित है। यहाँ पहले शून्य का अर्थ अभाव तथा तथा दुसरे शून्य का अर्थ अनंत है। इस प्रकार 'वह ब्रह्म शून्य या अभावस्वरुप नहीं, फिर भी शून्य या अनंतस्वरुप है', यह इस श्लोक का सुक्ष्म अर्थ है।

गोस्वामी तुलसीदास जी
द्वारा रचित रामचरित मानस के बालकाण्ड में शून्य के समवर्ती भाव दर्शाया है :-
   आदि अंत कोउ जासु न पावा,
                        मति अनुमानि निगम असगावा।।
अर्थात :-
जिनका आदि और अंत किसी ने नहीं जान पाया वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके इस प्रकार गाया है —
    बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना,
                        कर बिनु करम करइ बिधि नाना।
    आनन रहित सकल रस भोगी,
                       बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
अर्थात :-
वह (ब्रह्म) बिना पैर के ही चलता है, बिना कान के ही सुनता है, बिना हाथ के ही नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के सारे (छहों) रसों का आनंद     लेता है और बिना वाणी के ही बहुत योग्य वक्ता है।
     तन बिनु परस नयन बिनु देखा,
                                  ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ।
     असि सब भाँति अलौकिक करनी,
                                  महिमा जासु जाइ नहीं बरनी।।
अर्थात :-
वह बिना शरीर (त्वचा) के ही स्पर्श करता है, बिना आँख के ही देखता है और बिना नाक के ही सब प्रकार के गन्धों को ग्रहण करता है उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से एसी अलौकिक है का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
जिस तरह ब्रह्म की महिमा कही नहीं जा सकती उसी तरह गणित में शून्य की महिमा भी कही (वर्णन) नहीं जा सकती है।
आधुनिक गणितज्ञ ने भी शून्य के विषय में भारतीय ऋषि-मुनियों के अन्वेषण को सराहणीय बताया है :-

प्रो. जी. पी. हाल्स्टेड
अपनी पुस्तक "गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं" के पृष्ठ - 20 पर कहते हैं —  "शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा सकती। " कुछ नहीं" को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन् एक शक्ति देना हिन्दू जाती का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमो की शक्ति देने के समान है। अन्य कोई भी गणितीय आविष्कार बुद्धिमत्ता तथा शक्ति के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ। "
बी. बी. दत्ता ने
इसी संदर्भ में अपने प्रबंध में " संख्याओं को व्यक्त करने की विधि " ( इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली, अंक - 3, पृष्ठ 530 - 540) में कहा है —" हिन्दुओं ने दाशमिक प्रणाली बहुत पहले अपना ली थी। किसी भी अन्य देश की गणितीय अंकों की भाषा प्राचीन भारत के समान वैज्ञानिक तथा पूर्णता को नहीं प्राप्त कर सकी थी। उन्हें किसी भी संख्या को केवल दस बिंबों की सहायता से सरलता तथा सुन्दरतापूर्वक व्यक्त करने में सफलता मिली। हिन्दू संख्या अंकन पद्धति की इसी सुन्दरता ने विश्व में सभ्य समाज को आकर्षित किया तथा उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। "

गणितशास्त्र में शून्य —
महावीर आदि विद्वानों ने आकाश के पर्यायवाचक शब्दों को शून्य का पर्याय निरूपित किया है।

अाकाशं गगनं शून्यमम्बरम् खं नभो वियत् ।
                                     —( गणितसार संग्रह)

सर्वप्रथम 628 ई. के महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने गणितीय संक्रियाओं द्वारा इस प्रथम अभावरुप शून्य को उपलब्ध करने का यह प्रकार बताया है —

धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम् ।
                        (ब्रह्मस्फूट-सिद्धान्त  18 / 30)
अर्थात :-
दो समान धन संख्याओं में से एक धन संख्या का अन्तर, दो समान ऋण संख्याओं में से एक ऋण संख्या का अन्तर तथा क्रमशः धन, ऋण चिह्न वाली दो समान संख्याओं के योग का परिणाम  "ख"  अथवा शून्य होता है।
+5  —  (+5)  = 0
(—5) — (—5)  = 0
+5  +  ( — 5)  = 0

श्रीधराचार्य ने गुणन की संक्रियाओं के द्वारा इस प्रकार के शून्य को प्राप्त करने का यह उपाय बताया है —

खस्य गुणनादिके खं संगुणने खेन च खमेव ।
                       ( त्रिशतिका — सूत्र - 8)
अर्थात :-
शून्य को किसी राशि से गुणा इत्यादि करने पर या शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर परिणाम शून्य ही होता है।
   0 × 5 = 0 ,  5  ×  0  =  0

भास्कराचार्य ने अलग अलग शब्दों में यही तथ्य प्रकट किया है —
खहारो भवेत् खेन भक्तश्च राशिः ।
                       ( भास्करीय बीज गणित, श्लोक - 3)
खभाजितो राशि खहरः स्यात्।
                     ( लीलावती, शून्य परिकर्म, श्लोक - 3)
अर्थात :-
ख या शून्य से विभाजित राशि खहर या अनंत या परममहान होती है। इस प्रकार यहाँ अनंत को खहर यह अन्वर्थ परिभाषित नाम दिया है।
—ग्रीक भाषा में शून्य के लिए " केन्योस् (Kenyos)" शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है यही शून्य अरबी भाषा में " सिफ्र" शब्द के " खाली"  अर्थ के लिए अनुवाद को प्रयोग में लाया गया। यही सिफ्र अंग्रेजी में जीरो (zero) शब्द के रुप में विकसित है।
कोई भी व्यक्ति शून्य के आविष्कार पर आश्चर्य चकित होंगे ही क्योंकि संख्या लेखन में जिस स्थान पर "कुछ नहीं" लिखना है तब उस स्थान पर बिना कुछ लिखे संख्या लिख पाना कैसे संभव होगा? जैसे - एक सौ एक = 1 रिक्त स्थान 1 जिसमें दहाई का स्थान रिक्त है।  यदि रिक्त स्थान पर कुछ ना लिखें तो यह संख्या एक सौ एक नहीं होगी वल्कि ग्यारह हो जायेगी। अर्थात दहाई के स्थान पर कुछ तो लिखना पड़ेगा। गणितज्ञों के लिए यही सबसे बड़ी कठिनाई थी कि जहाँ "कुछ नहीं" लिखना है वहाँ कुछ कैसे लिखा जाए ?
      दुनिया के सामने आने वाले इस कठिनाई को हमारे गणितज्ञ ऋषि-मुनियों ने शून्य का आविष्कार कर हल कर दिया। "कुछ नहीं" के लिए "शून्य" पाकर दुनिया के गणितज्ञ हर्षित तथा आश्चर्यचकित भी हुए और इस आविष्कार के लिए उन्होंने भारतीय मनीषियों की मुक्त कंठ से प्रशंसा भी की।
सधन्यवाद
।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
(Person after Perfection becomes Personality)
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Friday, 17 June 2016

।। ऋग्वेद — प्राकृतिक संख्या।।

 June 17, 2016     No comments   

।। ऋग्वेद — Numerical words ।।
सूक्त  — 164
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा ।
त्रिनाभि चक्रमजरमनंर्व यत्रेमा विश्र्वा भुवनाधि तस्थुः ।। 2।।
पदार्थ  :-
(यत्र) जहाँ (एकचक्रम्) एक सब कलाओं के घुमने के लिए जिस में चक्कर है उस (रथम्) विमान आदि यान को (सप्तानामा) सप्तनामों वाला (एकः)  एक (अश्वः) शीघ्रगामी वायु व अग्नि (वहति) पहुँचता है वा जहाँ (सप्त) सात कलों के घर (युञ्जन्ति) युक्त होते हैं वा जहां (इमा) ये (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकलोकान्तर (अधि, तस्थुः) अधिष्ठित होते हैं वहाँ (अनर्वम्) प्राकृत प्रसिद्ध घोड़ों से रहित (अजरम्) और जीर्णता से रहित (त्रिनाभि) तीन जिस में बन्धन उस (चक्रम्) एक चक्कर को शिल्पी जन स्थापन करें।। 2।।

तिस्त्रो मातृृृ ृ स्त्रीन्पितृ ृ न्बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम् ।। 10।।
पदार्थ :-
जो (तिम्र) तीन (मातृ ृः) उत्तम, मध्यम्, अधम, भुमियों तथा (त्रीन) बिजुली और सूर्यरूप तीन (पितृ ृन) पालक अग्नियों को (ईम्) सब ओर से (विभ्रत) धारण करता हुआ (ऊर्ध्वः) ऊपर ऊँचा (एकः) एक सूत्रात्मा वायु (तस्थौ) स्थिर होता है जो विद्वान् जन उसको (अव, ग्तापयन्ति) कहते सुनते अर्थात उस के विषय में वार्तालाप करते हैं तथा (अविश्वमिन्वाम्) जो सब से न सेवन किई गई (विश्वमिदम्) सब लोग उस को प्राप्त होते उस (वाचम्) वाणी को (मन्त्रयन्ते) सब ओर से विचारपूर्वक गुप्त कहते हैं वे (अमुष्य) उस दूरस्थ (दिवः) प्रकाशमान सूर्य के (पृष्ठे) परभाग में विराजमान होते हैं वे (न) नहीं दुख को प्राप्त होते हैं।। 10।।

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Wednesday, 15 June 2016

।। प्राचीन भारतीय आविष्कारक।।

 June 15, 2016     No comments   

हमारे महान ऋषि अविष्कारक – हमारा भारत।

भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान व चमत्कारों से अटी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किए व युक्तियां बताईं। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है।
कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र-शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा।
अगले पृष्ठों पर जानिए ऐसे ही असाधारण या यूं कहें कि प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे –

1. महर्षि दधीचि –

महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि
एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरु बनाकर काम चलाना पड़ा, किंतु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इंद्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था। उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इंद्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ इधर-उधर भटकने लगे।
ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इंद्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियां मांगने के लिये भेजा। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए अपनी हड्डियां दान में मांगी। महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया। इस तरह एक महान ऋषि के अतुलनीय त्याग से देवराज इंद्र बचे और तीनों लोक सुखी हो गए।

2. आचार्य कणाद –

कणाद परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।

3. भास्कराचार्य –

आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

4. आचार्य चरक –

‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की।

5. भारद्वाज –

आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का आविष्कार किया। वहीं हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का आविष्कारक भी माना जाता है।

6. कण्व

वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ परंपरा भी कण्व की देन मानी जाती है।

7. कपिल मुनि –

भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माने जाते हैं। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि ‘सांख्य दर्शन’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही ‘सांख्य दर्शन’ कहलाता है।
इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया। बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया।

8. पतंजलि –

आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

9. शौनक :

वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी।

10. महर्षि सुश्रुत –

ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।

11. वशिष्ठ :

वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही थी।

12. विश्वामित्र :

ऋषि बनने से पहले विश्वामित्र क्षत्रिय थे। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी।
ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया।

13. महर्षि अगस्त्य –

वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरुण देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे। उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया। इससे सारे राक्षसों का अंत हुआ।

14. गर्गमुनि –

गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।

15. बौद्धयन –

भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।
सधन्यवाद

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