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परिचय (Introduction) - भारतीय विज्ञान परंपरा (Bhartiya Vigyan Prampara)

।। भारतीय विज्ञान परंपरा।।

भारतवर्ष में वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन-अनुसंधान की परंपरा वैदिक काल से है। अनेकों ऋषि-मुनियों तथा मनीषियों ने इसके लिए अपने अमूल्य जीवन का सर्वस्व अर्पित किया है। भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, अत्रि, गर्ग, शौनक, नारद, चक्रायण, अगस्त्य आदि प्रमुख हुए जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया।
उदाहरण के लिए महाऋषि भृगु अपने शिल्प शास्त्र में शिल्पा की परिभाषा करते हुए जो लिखते हैं उससे ज्ञान की परिधि कितनी व्यापक थी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है —
नानाविधानं वस्तुनां यंत्राणाँ कल्पसंपदा
धातुनां साधनानां च वस्तुनां शिल्पसंज्ञितम् ।
कृषिर्जलं खनिश्चेति धातुखण्डं त्रिधाभिधम् ।।
नौका-रथाग्नियानानां, कृतिसाधनमुच्यते।
वेश्म, प्रकार, नगररचना वास्तु संज्ञितम्।।
                                                   - भृगु संहिता
अर्थात् —
भृगु दस शास्त्र का उल्लेख करते हैं — कृषि शास्त्र, जल शास्त्र, खनि शास्त्र, नौका शास्त्र, रथ शास्त्र, अग्नियान शास्त्र, वेश्म शास्त्र, प्रकार शास्त्र, नगर रचना, यंत्र शास्त्र। इसके अतिरिक्त 32 प्रकार की विद्याएं तथा 64 प्रकार की कलाओं का उल्लेख आता है। इसकी विषय-सूची देखकर लगता है कि इनकी परिधि संपूर्ण जीवन में व्याप्त करने वाली थी। इन विद्याओं के अनेक ग्रंथ थे, कितने ही लुप्त हो गये। कई विद्याएं, जानने वाले के साथ ही लुप्त हो गई क्योंकि हमारे यहाँ एक मान्यता रही है कि अयोग्य पात्र के हाथ विद्या नहीं जानी चाहिए। यद्यपि यह सत्य है कि बहुत सा ज्ञान लुप्त हो चुका है, परन्तु आज भी लाखों पांडुलिपियाँ बिखरी पड़ी है। आवश्यकता है उनके अध्ययन, विश्लेषण और प्रयोग की। इस प्रक्रिया से शायद ज्ञान के नये क्षेत्र उद्घाटित हो सकते हैं। अतः प्रयास किया गया है कि विषय प्रेमी की रुचि भारतीय विरासत को समझे एवं नई सोच के साथ भावि पीढ़ी को हस्तांतरित करे।

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