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Monday, 24 October 2016

।। सत्संग - डाकू से संत।।

 October 24, 2016     No comments   

आखिर एक डाकू कैसा बना रामायण का रचयिता

बहुत समय पहले की बात है किसी राज्य में एक बड़े ही खूंखार डाकू का भय व्याप्त था। उस डाकू  का नाम रत्नाकर था। वह अपने साथियों के साथ जंगल से गुजर रहे राहगीरों को लूटता और विरोध करने पर उनकी हत्या भी कर देता।
एक बार देवऋषि नारद भी उन्ही जंगलों से भगवान का जप करते हुए जा रहे थे। जब वे घने बीहड़ों में पहुंचे तभी उन्हें कुछ लोग विपरीत दिशा में भागते हुए दिखे।
देवऋषि ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो सभी ने मार्ग में रत्नाकर के होने की बात बतायी। पर बावजूद इसके देवऋषि आगे बढ़ने लगे।
क्या आपको भय नहीं लगता ?, भाग रहे लोगों ने उन्हें ऐसा करते देख पूछा।
नहीं, मैं मानता ही नहीं की मेरे आलावा यहाँ कोई और है, और भय तो हमेशा किसी और के होने से लगता है, स्वयं से नहीं। ऋषि ने ऐसा कहते हुए अपने कदम आगे बढ़ा दिए।
कुछ ही दूर जाने पर  डाकू  रत्नाकर अपने साथियों के साथ उनके समक्ष आ पहुंचा।
रत्नाकर – नारद, मैं रत्नाकर हूँ, डाकू  रत्नाकर।
नारद मुस्कुराते हुए बोले – मैं नारद हूँ देवऋषि नारद, तुम्हारा अतिथि और मैं निर्भय हूँ। क्या तुम निर्भय हो ?
रत्नाकर – क्या मतलब है तुम्हारा ?
नारद – ना मुझे प्राणो का भय है, ना असफलता का, ना कल का ना कलंक का, और कोई भय है जो तुम जानते हो ? अब तुम बताओ क्या तुम निर्भय हो ?
रत्नाकर – हाँ, मैं निर्भय हूँ, ना मुझे प्राणो का भय है, ना असफलता का, ना कल का ना कलंक का।
नारद – तो तुम यहाँ इन घने जंगलों में छिप कर क्यों रहते हो ? क्या राजा से डरते हो ?
रत्नाकर – नहीं !
नारद – क्या प्रजा से डरते हो ?
रत्नाकर- नहीं !
नारद- क्या पाप से डरते हो ?
रत्नाकर – नहीं !
नारद – तो यहाँ छिप कर क्यों रहते हो ?
यह सुनकर रत्नाकर घबरा गया और एकटक देवऋषि को घूरने लगा।
नारद – उत्तर मैं देता हूँ। तुम पाप करते हो और पाप से डरते हो।
रत्नाकर हँसते हुए बोला – नारद तुम अपनी इन बातों से मुझे भ्रमित नहीं कर सकते। ना मैं पाप से डरता हूँ, ना पुण्य से, ना देवताओं से ना दानवों से, ना राजा से ना राज्य से, ना दंड से ना विधान से। मैंने राज्य के साथ द्रोह किया है, मैंने समाज के साथ द्रोह किया है, इसलिए मैं यहाँ इन बीहड़ों में रहता हूँ। ये प्रतिशोध है मेरा।
नारद – क्या था वो पाप जिससे तुम डरते हो ?
रत्नाकर- मुझे इतना मत उकसाओ की मैं तुम्हारी हत्या कर दूँ नारद। इतना तो मैं जान ही चुका हूँ कि पाप और पुण्य की परिभाषा हमेशा ताकतवर तय करते हैं और उसे कमजोरों पर थोपते हैं। मैंने साम्राज्यों का विस्तार देखा है, हत्या से, बल से, छल से, मैंने वाणिज्य का विस्तार देखा है, कपट से, अनीति से, अधर्म से, वो पाप नहीं था? मैं सैनिक था, दुष्ट और निर्दयी सौदागरों की भी रक्षा की… वो पाप नहीं था? युद्ध में हारे हुए लोगों की स्त्रियों के साथ पशुता का व्यवहार करने वाले सैनिकों की हत्या क्या की मैंने, मैं पापी हो गया? राजा, सेना और सेनापति का अपराधी हो गया मैं। क्या वो पाप था?
नारद – दूसरों का पाप अपने पाप को सही नहीं ठहरा सकता रत्नाकर।
रत्नाकर चीखते हुए – मैं पापी नहीं हूँ।
नारद – कौन निर्णय करेगा ? वो जो इस यात्रा में तुम्हारे साथ हैं या नहीं हैं? क्या तुम्हारी पत्नी, तुम्हारा पुत्र, इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ?
रत्नाकर – हाँ, वो क्यों साथ नहीं होंगे, मैं जो ये सब करता हूँ, उनके सुख के लिए ही तो करता हूँ। तो जो तुम्हारे साथ हैं उन्ही को निर्णायक बनाते हैं। जाओ, अपनी पत्नी से, अपने पुत्र से, अपने पिता से, अपने निकट सम्बन्धियों से पूछ कर आओ, जो तुम कर रहे हो, क्या वो पाप नहीं है, और क्या वे सब इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ? इस पाप के भागीदार हैं ?
रत्नाकर – ठीक है मैं अभी जाकर लौटता हूँ।
और अपने साथियों को नारद को बाँध कर रखने का निर्देश देकर रत्नाकर सीधा अपनी पत्नी के पास जाता है और उससे पूछता है – ये मैं जो कर रहा हूँ, क्या वो पाप है? क्या तुम इस पाप में मेरी भागीदार हो?
पत्नी कहती है,  नहीं स्वामी, मैंने आपके सुख में, दुःख में साथ देने की कसम खाई है, आपके पाप में भागीदार बनने की नहीं।
यह सुन रत्नाकर स्तब्ध रह जाता है।  फिर वह अपने अंधे पिता के समक्ष यही प्रश्न दोहराता है, पिताजी, ये जो मैं कर रहा हूँ, क्या वो पाप है? क्या आप इस पाप में मेरी भागीदार हैं ?
पिताजी बोलते हैं, नहीं पुत्र, ये तो तेरी कमाई है, इसे मैं कैसे बाँट सकता हूँ।
यह सुनते ही मानो रत्नाकर पर बिजली टूट पड़ती है। वह बेहद दुखी हो जाता है और धीरे – धीरे चलते हुए वापस देवऋषि नारद के पास पहुँच जाता है।
नारद- तुम्हारे साथी मुझे अकेला छोड़ जा चुके हैं रत्नाकर।
रत्नाकर, देवऋषि के चरणो में गिरते हुए – क्षमा देवऋषि क्षमा, अब तो मैं भी अकेला ही हूँ।
नारद – नहीं रत्नाकर, तुम्ही अपने मित्र, और तुम्ही अपने शत्रु हो, तुम्हारे पुराने संसार की रचना भी तुम्ही ने की थी..तुम्हारे नए संसार की रचना भी तुम्ही करोगे। इसलिए उठो और अपने पुरुषार्थ से अपना भविष्य लिखो…. राम-राम, तुम्हारा पथ शुभ हो।
इस घटना के पश्चात डाकू रत्नाकर का जीवन पूरी तरह बदल गया, उसने पाप के मार्ग को त्याग, पुण्य के मार्ग को अपनाया और आगे चलकर यही डाकू  राम-कथा का रचयिता महर्षि वाल्मीकि बना।

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।। विदुर के छः दर्शन।।

 October 24, 2016     No comments   

सिर्फ किस्मत वालों को मिलती हैं जिंदगी में ये 6 सौगात: महाभारत काल में बताया गया है
महात्मा विदुर जीवन दर्शन और राजनीति के महान ज्ञाता थे। विदुर नीति में मानव और राष्ट्र के कल्याण के लिए आवश्यक नियमों का संग्रह किया गया है।

विदुर ने ऐसी अनेक बातों के बारे में बताया है जो मनुष्य के दुख का कारण बनती हैं। वहीं उन्होंने ऐसी हिदायतों का जिक्र भी किया है जो हमें अनेक दुखों से बचाती हैं। जानिए विदुर के अनुसार जीवन की उन सौगातों के बारे में, जिन्हें प्राप्त करने वाला यकीनन बहुत भाग्यशाली होता है।

1– अगर किसी व्यक्ति के पास गुण हैं और जीवन जीने के लिए पर्याप्त धन भी है, तो वह मनुष्य भाग्यशाली है। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, उसका जीवन बहुत कष्टपूर्ण होता है। निर्धनता अत्यंत कष्टदायक होती है। अतः विदुर ने गुणों के साथ ही धन को भी जरूरी माना है।

2– अगर मनुष्य में गुण हों, धन भी हो लेकिन स्वास्थ्य अच्छा न हो तो उसका जीवन सुखमय नहीं माना जा सकता। निरोगी काया ही धन का सदुपयोग कर सकती है। वही सद्गुणों का जीवन में ठीक प्रकार से इस्तेमाल कर सकती है।

अगर शरीर ही स्वस्थ नहीं होगा तो मनुष्य जीवनभर रोगों से जूझता रहेगा। इस प्रकार वह न तो कल्याणकारी कार्य कर सकता है और न किसी का हित कर सकता है।

3– अगर पत्नी मनपसंद हो, रूपवती हो तो विदुर ने उस मनुष्य का जीवन सुखद माना है। हालांकि सिर्फ रूप ही सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं होती। गुणों का भी विशेष महत्व है। गुणरहित रूप सुखदायक नहीं होता।

4– विदुर ने सुंदर रूप के साथ ही एक और बात जोड़ी है- मधुर स्वभाव यानी मधुर वाणी बोलने वाली पत्नी। अगर पत्नी अपने पति से अच्छा बर्ताव न करे, तो उस घर में आए दिन विवादों की आशंका होती है। ऐसे घर में पति-पत्नी दोनों दुखी रहते हैं। अतः रूपवती होने के साथ ही मधुर व्यवहार भी सद्गुण है।

5– अगर कोई मनुष्य ऐसी विद्या जानता हो जिससे वह जीवन के लिए धन अर्जित कर सके तो वह बहुत भाग्यशाली है। वह स्वयं के बल पर अपना जीवन सुखपूर्वक चला सकता है। खुद का हुनर उसके लिए वरदान साबित हो सकता है, जिससे वह दूसरों पर आश्रित नहीं होता।

6– संतान का आज्ञाकारी होना, शुभ लक्षणों और गुणों से युक्त होना भी सौभाग्य की बात होती है। अगर स्वयं गुणवान, धनी और सज्जन हों तथा संतान व्यसन तथा अपव्यय करने वाली और दुष्ट हो तो उस व्यक्ति का जीवन अत्यंत दुखमय होता है।

इसलिए संतान को हमेशा शुभ संस्कार देने चाहिए। विदुर कहते हैं कि जिसकी संतान अच्छी है, वह बहुत ही सौभाग्यशाली होता है।

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।। नाव में लोकतंत्र।।

 October 24, 2016     No comments   

।। नाव में लोकतंत्र।।
एक समय की बात है एक राजा अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था । उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक महात्मा भी थे ।
.कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था ।
वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था ।
.नाव का मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी ।
वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा ।परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था ।
ऐसी स्थिति देखकर राजा भी गुस्से में था ।परंतु कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था ।नाव में बैठे महात्मा से रहा नहीं गया ।
वह राजा के पास गया और बोला - "महाराज ! अगर आप अनुमति दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ ।" राजा ने तत्काल अनुमति दे दी ।
महात्मा ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया । कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा । उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे । कुछ देर बाद महात्मा ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया ।
तत्पश्चात.......
वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया ।नाव के यात्रियों के साथ राजा को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ ।
राजा ने महात्मा से पूछा - "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था, अब देखो कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है ?"
महात्मा बोले - महाराज, "पानी की कद्र वही करता है जो कभी रेगिस्तान से गुजरा हो, खुद कष्ट का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है । इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी ।"
निष्कर्ष :-  भारत में रहकर भारत को गाली देने वाले कुत्तों के लिए समर्पित ....
वैधानिक चेतावनी :- उपरोक्त विषय का किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नहीं है यदि कोई संबंध मिलता है तो इसे महज एक संयोग कहा जायेगा....
सधन्यवाद

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।। कलावा (मौली) - एक विज्ञान।।

 October 24, 2016     No comments   

कलावा (मौली) क्यों बांधते हैं?
मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। इसे लोग कलावा भी कहते हैंl यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।
मौली का अर्थ : '
मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।
कैसी होती है मौली? :
मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।
कहां-कहां बांधते हैं मौली? :
मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।
मौली बांधने के नियम :
*शास्त्रों के अनुसार पुरुषों
एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।
*कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।
*मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।
कब बांधी जाती है मौली? :
*पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
*हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
*प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।
क्यों बांधते हैं मौली? :
* मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।
* किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
* किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।
* मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।
* किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।
* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
* इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।
मौली करती है रक्षा :
मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।
इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।
आध्यात्मिक पक्ष :
*शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।
*यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।
*इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।
*कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।
चिकित्सीय पक्ष :
प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।
हाथ में बांधे जाने का लाभ :
शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है।
कमर पर बांधी गई मौली :
कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।
मनोवैज्ञानिक लाभ :
मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।
सधन्यवाद।

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।। आधुनिक विकास वाकई या विनाश।।

 October 24, 2016     No comments   

।। आधुनिक विकास - वाकई, या विनाश।।
क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय संस्कृति आखिर अबतक क्यों बची हुयी है ?
हजारों वर्ष पहले मिस्र में ऊँचे ऊँचे पिरामिड बनाए गए, उनकी तकनीक बेहद विकसित थी, बड़े बड़े शहर थे उनके लेकिन सब नष्ट हो गए।
इसी तरह यूनान में बड़े बड़े विकसित शहर हजारो वर्ष पहले थे। उनके आलीशान महल विशाल क्रीडा स्थल और बहुत वैज्ञानिक ढंग से बने शहर आज भी तकनीकी का कमाल माने जाते हैं, लेकिन सब नष्ट हो गए।
कुछ ऐसा ही था माया सभ्यता के साथ, माया सभ्यता के बचे हुए अवशेषों और उनके निर्माणों को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी स्थापत्य कला बेहद कुशल और वैज्ञानिक थी लेकिन उनके भी कोई निशान ना बचे, वो भी समाप्त हो गये।
मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं का तो कुछ ख़ास अवशेष भी ना बच पाया सिर्फ वही मिले जो खुदाई के पश्चात् प्राप्त हुए।
यही कहानी प्राचीन रोम की भी है। सिन्धु घाटी में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो में हजारो वर्ष पहले बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से विकसित शहर थे लेकिन वे भी नष्ट हो गए।
इन सब सभ्यताओं के समाप्त होने और मिट जाने के बावजूद भी धरती पर भारतीय सभ्यता बची रही है जो आज भी जीवंत है।
इसका कारण है हमारे पास ऐसे महाविद्वान परम तपस्वी ऋषि मुनि थे जिन्हें सृष्टि का रहस्य ज्ञात था। उन्हें अच्छे से इसका पता था कि, भौतिक चीजें इस धरती पर ज्यादा दिन नहीं टिक सकती हैं।
हमारे पूर्वज बेहद साधारण प्रकार से वनों में जीवन गुजारते थे, बिना प्रकृति को नष्ट किये।यहाँ निवास करते हुए भी वे विज्ञान के बड़े से बड़े रहस्य सुलझाते थे।
चाहते तो वे भी आलीशान ऊँची इमारतो में वातानुकूलित प्रसादों में रह सकते थे, लेकिन उन्होंने प्रकृति के साथ जीना ही स्वीकार किया।
ऐसा ऋषियों की संस्कृति नष्ट नहीं हुई, आज भी जीवित है। अनेकों वनवासी प्रजातियाँ लाखों वर्षों से अपने आपको बचाए हुए है।
ये भारतीय संस्कृति है जहाँ प्रकृति की पूजा की जाती है, जहाँ पेड़ों में देवताओं का वास माना जाता है, लोग नदियों को माँ मानते हैं, सूर्य चन्द्रमा और अन्य ग्रहों की उपासना करते हैं।
प्रकृति के इतने करीब रहने और भौतिकता से दूरी बनाये रखने के कारण ही भारत आज भी जीवंत है।
आज यह सोचने का विषय है कि, जब भौतिकता को बढावा देने वाली इतनी सभ्यताएं मिट गईं तो क्या प्रकृति को नष्ट करके अपनी हवस पूरी करने के लिए आज मानव जो अंधाधुंध विकास कर रहा है, क्या वो बहुत समय टिक पायेगा ?
उपरोक्त विषय पर चिन्तन करने से यह ज्ञात होता है कि हमें विकास की नई परिभाषा की आवश्यकता है तथा हमें अपने शब्दकोश में सुधार की जरूरत है क्योंकि यदि आपको अपने प्राचीन धरोहर को पूर्णतः समझना है तो शब्दकोश में सुधार अतिआवश्यक है तथा हमें विनाश तथा विकास की नई परिभाषा समझने की आवश्यकता है क्योंकि जिस गति से आज प्रकृति का दोहन किया जा रहा है तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है उस गति से अधिक से अधिक पचास से सौ साल ही समय हमारे पास है....
आज जो पर्यावरण संरक्षण की बातें हो रही है वह मात्र छलावा है जिसका पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है.... यह सब प्रयास राजनीतिक, व्यापारिक तथा आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है।
कुछ ज्ञानियों का मानना है कि वेदों की ओर लौटो परन्तु वेदों को समझने वाला शब्दकोश तथा समझाने वाला गुरु दोनों ही विलुप्त प्राय हो गये हैं।
आवश्यकता है आत्मीय प्रयास की जो मानव में मानवता का भाव भर दे।
सधन्यवाद
अनिल ठाकुर।

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।। स्मार्ट-सिटी (अयोध्या)।।

 October 24, 2016     No comments   

विश्व की पहली स्मार्ट सिटी है अयोध्या

आज के आधुनिक विश्व में ऐसी कोई विधा नहीं, कोई ज्ञान नहीं, कोई आविष्कार नहीं या फिर कोई कला नहीं जिसका वर्णन भारतीय स्वर्णिम इतिहास के वैदिक ग्रन्थ, पुराण तथा महापुराण में मौजूद न हो, हमारे देश प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भले ही देश में 100 स्‍मार्ट सिटी बनाने का लक्ष्‍य रखा हो और फिलहाल इसके लिए 20 शहरों के नामों की घोषणा भी कर दी हो लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि दुनिया की पहली ‘स्‍मार्ट सिटी’ अयोध्‍या थी। हैरान रह गए ना आप। लेकिन, ये हम नहीं कह रहे बल्‍कि इसके सबूत हमें वाल्‍मीकि रामायण, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस, स्कंध पुराण इत्यादि के भीतर ही मिलते हैं।

वाल्‍मीकि रामायण के पांचवे सर्ग में अयोध्‍या पुरी का वर्णन विस्‍तार से किया गया है। आइए जानते हैं क्‍यों थी अयोध्‍या दुनिया की सबसे पुरानी स्‍मार्ट सिटी।
साकेतपुरी अयोध्‍या का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्‍मीकि, रामायण के बालकांड के पांचवें सर्ग के पांचवें श्‍लोक में लिखते हैं :-

”कोसल नाम मुदित: स्‍फीतो जनपदो महान।
निविष्‍ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्‍यवान्।। (1/5/5)

अर्थात : सरयू नदी के तट पर संतुष्‍ट जनों से पूर्ण धनधान्‍य से भरा-पूरा, उत्‍तरोत्‍तर उन्‍नति को प्राप्‍त कोसल नामक एक बड़ा देश था। वाल्‍मीकि आगे लिखते हैं –

”इसी देश में मनुष्‍यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्‍यात अयोध्‍या नामक एक नगरी थी। (1/5/6)

नगर की लंबाई चौड़ाई और सड़कों के बारे में महर्षि वाल्‍मीकि लिखते हैं –

”यह महापुरी बारह योजन (96 मील) चौड़ी थी। इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं। (1/5/7)

अयोध्‍या नगरी
वाल्‍मीकि जी सड़कों की सफाई और सुंदरता के बारे में लिखते हैं :
”वह पुरी चारो ओर फैली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुशोभित थी। सड़कों पर नित्‍य जल छिड़का जाता था और फूल बिछाये जाते थे। (1/5/8)

महर्षि आगे लिखते हैं –  ”इंद्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था। इस पुरी में राज्‍य को खूब बढ़ाने वाले महाराज दशरथ उसी प्रकार रहते थे जिस प्रकार स्‍वर्ग में इन्‍द्र वास करते हैं।”  (1/5/9)

साकेत पुरी की सुंदरता का बखान करते हुए वाल्‍मीकि लिखते हैं :
”इस पुरी में बड़े-बड़े तोरण द्वार, सुंदर बाजार और नगरी की रक्षा के लिए चतुर शिल्‍पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्‍त्र रखे हुए थे।” (1/5/11)
उसमें सूत, मागध बंदीजन भी रहते थे, वहां के निवासी अतुल धन सम्‍पन्‍न थे, उसमें बड़ी-बड़ी ऊंची अटारियों वाले मकान जो ध्‍वजा पताकाओं से शोभित थे और परकोटे की दीवालों पर सैकड़ों तोपें चढ़ी हुई थीं। (1/5/12)

नगर के बागों उद्यानों पर प्रकाश डालते हुए महर्षि वाल्‍मीकि लिखते हैं :
”स्‍त्रियों की नाट्य समितियों की भी यहां कमी नहीं है और सर्वत्र जगह-जगह उद्यान निर्मित थे। आम के बाग नगरी की शोभा बढ़ाते थे। नगर के चारो ओर साखुओं के लंबे-लंबे वृक्ष लगे हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो अयोध्‍या रूपिणी स्‍त्री करधनी पहने हो।” (1/5/13)

अयोध्‍या में खुदाई से प्राप्‍त विष्‍णुहरि शिलालेख
नगर की सुरक्षा और पशुधन का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्‍मीकि लिखते हैं :
”यह नगरी दुर्गम किले और खाई से युक्‍त थी तथा उसे किसी प्रकार भी शत्रु जन अपने हाथ नहीं लगा सकते थे। हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्‍चर जगह-जगह दिखाई पड़ते थे। (1/5/14)

”राजभवनों का रंग सुनहला था, विमान गृह जहां देखो वहां दिखाई पड़ते थे।”  (1/5/16)

”उसमें चौरस भूमि पर बड़े मजबूत और सघन मकान अर्थात बड़ी सघन बस्‍ती थी। कुओं में गन्‍ने के रस जैसा मीठा जल भरा हुआ था।” (1/5/17)

”नगाड़े, मृदंग, वीणा, पनस आदि बाजों की ध्‍वनि से नगरी सदा प्रतिध्‍वनित हुआ करती थी। पृथ्‍वीतल पर तो इसकी टक्‍कर की दूसरी नगरी थी ही नहीं।”  (1/5/18)

”उस उत्‍तम पुरी में गरीब यानी धनहीन तो कोई था ही नहीं, बल्‍कि कम धन वाला भी कोई न था, वहां जितने कुटुम्‍ब बसते थे, उन सब के पास धन-धान्‍य, गाय, बैल और घोड़े थे।(1/6/7)

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड दोहा संख्या 20 से दोहा संख्या 29 के बीच रामराज्य का वर्णन करते हुए अयोध्या नगरी की भव्यता का वर्णन किया है
सर्वप्रथम यह बताया गया है कि अयोध्या के निवासी

वैदिक मार्ग का अनुसरण करते थे...
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।। 20।।

राज्य में किसी को कोई कष्ट नहीं था..
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि व्यापा।।

दीर्घ जीवनप्रत्यासा, निर्धनता का आभाव..
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

नगरी की शिक्षा व्यवस्था..
नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
सब गुनग्य सब पंडित ग्यानी।

न्याय व्यवस्था..
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।। 22।।

पर्यावरण प्रदूषण रहित था...
सीतल सुरभि पवन बह मंदा।
गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ।।

नदियाँ भी प्रदुषण रहित था....
सरिता सकल बहहिं बर बारी।
सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।

कृषि व्यवस्था...
ससि सम्पन्न सदा रह धरनी।

सडकें...
महि बहु रंग रचित गच काँचा।

भवन...
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत।
कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ।।

बाजार, व्यापार तथा व्यापारी...
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए ।
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।

भेदभाव रहित वर्ण व्यवस्था...
राजघाट सब बिधि सुन्दर बर।
मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।

वैभव पूर्ण
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।। 29।।

अर्थात -
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि हमारा अतीत में अत्यंत समृद्ध, शक्तिशाली तथा वैभव पूर्ण नगरी अयोध्या थी जिसको भक्त वत्सल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम ने और अधिक समृद्ध बनाया...

ऐसे निर्मित हुई अयोध्‍या
पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार एक बार ब्रह्माजी के पास पहुंचकर मनु ने सृष्‍टिलीला में निरत होने के लिए उपयुक्‍त स्‍थान सुझाने का आग्रह किया। इसपर ब्रह्माजी उन्‍हें लेकर भगवान विष्‍णु के पास पहुंचे। तब भगवान विष्‍णु ने मनु को आश्‍वासन दिया कि समस्‍त ऐश्‍वर्यसंपूर्ण साकेतधाम मैं अयोध्‍यापुरी भूलोक में प्रदान करता हूं।
भगवान विष्‍णु ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा जी तथा मनु के साथ देवशिल्‍पी विश्‍वकर्मा को भेज दिया। इसके अलावा अपने रामावतार के लिए उपयुक्‍त स्‍थान ढूंढ़ने के लिए महर्षि वसिष्‍ठ को भी उनके साथ भेजा। मान्‍यता है कि वसिष्‍ठ द्वारा सरयू नदी के तट पर लीलाभूमि का चयन किया गया जहां विश्‍वकर्मा ने नगर का निर्माण किया। स्‍कंद पुराण के अनुसार अयोध्‍या भगवान विष्‍णु के चक्र पर विराजमान है। इसी पुराण के अनुसार अयोध्‍या में ‘अ’ कार ब्रह्मा, ‘य’ कार विष्‍णु और ‘ध’ कार रुद्र का ही रूप है।
सधन्यवाद...

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