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Tuesday, 22 January 2019

परिचय (Introduction) - भारतीय विज्ञान परंपरा (Bhartiya Vigyan Prampara)

 January 22, 2019     भारतीय विज्ञान     No comments   

।। भारतीय विज्ञान परंपरा।।

भारतवर्ष में वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन-अनुसंधान की परंपरा वैदिक काल से है। अनेकों ऋषि-मुनियों तथा मनीषियों ने इसके लिए अपने अमूल्य जीवन का सर्वस्व अर्पित किया है। भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, अत्रि, गर्ग, शौनक, नारद, चक्रायण, अगस्त्य आदि प्रमुख हुए जिन्होंने विमान विद्या, नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, जहाज निर्माण और जीवन के सभी क्षेत्रों में काम किया।
उदाहरण के लिए महाऋषि भृगु अपने शिल्प शास्त्र में शिल्पा की परिभाषा करते हुए जो लिखते हैं उससे ज्ञान की परिधि कितनी व्यापक थी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है —
नानाविधानं वस्तुनां यंत्राणाँ कल्पसंपदा
धातुनां साधनानां च वस्तुनां शिल्पसंज्ञितम् ।
कृषिर्जलं खनिश्चेति धातुखण्डं त्रिधाभिधम् ।।
नौका-रथाग्नियानानां, कृतिसाधनमुच्यते।
वेश्म, प्रकार, नगररचना वास्तु संज्ञितम्।।
                                                   - भृगु संहिता
अर्थात् —
भृगु दस शास्त्र का उल्लेख करते हैं — कृषि शास्त्र, जल शास्त्र, खनि शास्त्र, नौका शास्त्र, रथ शास्त्र, अग्नियान शास्त्र, वेश्म शास्त्र, प्रकार शास्त्र, नगर रचना, यंत्र शास्त्र। इसके अतिरिक्त 32 प्रकार की विद्याएं तथा 64 प्रकार की कलाओं का उल्लेख आता है। इसकी विषय-सूची देखकर लगता है कि इनकी परिधि संपूर्ण जीवन में व्याप्त करने वाली थी। इन विद्याओं के अनेक ग्रंथ थे, कितने ही लुप्त हो गये। कई विद्याएं, जानने वाले के साथ ही लुप्त हो गई क्योंकि हमारे यहाँ एक मान्यता रही है कि अयोग्य पात्र के हाथ विद्या नहीं जानी चाहिए। यद्यपि यह सत्य है कि बहुत सा ज्ञान लुप्त हो चुका है, परन्तु आज भी लाखों पांडुलिपियाँ बिखरी पड़ी है। आवश्यकता है उनके अध्ययन, विश्लेषण और प्रयोग की। इस प्रक्रिया से शायद ज्ञान के नये क्षेत्र उद्घाटित हो सकते हैं। अतः प्रयास किया गया है कि विषय प्रेमी की रुचि भारतीय विरासत को समझे एवं नई सोच के साथ भावि पीढ़ी को हस्तांतरित करे।

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Sunday, 20 January 2019

नारायण पंडित |Narayana Pandit |

 January 20, 2019     भारतीय गणितज्ञ     No comments   

।। भारतीय गणितज्ञ-नारायण पंडित (01) ।।

केरला के महान गणितज्ञ जिनका कार्यकाल 1325 ई. से 1400 ई. के बीच रहा। इनके पिता का नाम नरसिम्हा था। आर्यभट्ट तथा भास्कराचार्य - ।। से प्रभावित हो कर गणित के विभिन्न क्षेत्रों में अनुपम योगदान दिया, इन्होंने अंकगणित, बीज-गणित, ज्यामिती, जादूई-वर्ग इत्यादि अनेक विषयों पर कार्य किया है। सन् 1356 ई. में इन्होंने गणित कौमुदी की रचना की साथ ही भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा रचित लीलावती के उपर टिप्पणी 'कर्मप्रदीपिका' की रचना की।

विभिन्न क्षेत्रों में आपके द्वारा किये गये कुछ कार्य —
   ~ अंकगणित —
इसके अन्तर्गत आपने वर्ग करने की नई विधि की रचना की थी
  (i)  P² = (p + q)² = p² + q² + 2pq 
       (24)² = (20 + 4)²
                 = 20² + 4² + 2×20 × 4
                 = 400 + 16 + 160
                 = 576
  (ii) N² = (N - a) (N+ a) + a²
       (24)² = ( 24 - 4) ( 24+ 4) + 4²
                 = 20 × 28 + 16
                 = 576
इसके अलावा गुणन के प्रक्रिया को कपाट-संधि विधि से बताया।

उन्होंने 10 के वर्ग मूल के लिए 3 जोड़ी हल दिये जहाँ x तथा y है (6, 19), (228, 721) तथा (8658, 27379) जो कि 10 के वर्ग मूल का कई अंकों तथा शुद्ध मान देता है —
(1) 10 का वर्ग मूल = 19 / 6 = 3.16667
(2) 10 का वर्ग मूल = 721 / 228 = 3.1622807
(3) 10 का वर्ग मूल = 27379 / 8658 = 3.162277662 (दशमलव के आठ अंकों तक)

   ~ बीज-गणित —
         - आर्यभट्ट की कुट्टक प्रक्रिया पर विस्तार से कार्य किया।
         - भास्कराचार्य - ii के चक्रवाल पद्धति Nx² + 1 = y² पर भी विस्तृत चर्चा की

उन्होंने इसके कई हल दिये —
   ~ 97x² + 1 = y²   : इसका हल x = 6377352 तथा y = 63809633
  ~ 103x² + 1 = y² : इसका हल x = 2249 तथा y = 227528

        - नारायण पंडित की गुणनखण्डन प्रक्रिया जोकि आजकल हम फरमेट गुणनखण्डन विधि के नाम से जानते हैं।

  ~ ज्यामिती —
इस विषय के अन्तर्गत आपने कई विषयों पर कार्य किया है।
चक्रीय चतुर्भुज :-
(1) यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएं दी गई हो तो उसके केवल तीन विकर्ण संभव है।
(2) किसी चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल उसके तीनों विकर्णों के योग को त्रिज्या के चार गुणा से विभाजित कर प्राप्त किया जा सकता है या तीनों विकर्णों को परिवृत के व्यास के दो गुणा से विभाजित कर प्रात किया जा सकता है।
(3) उन्होंने चक्रीय चतुर्भुज के परिवृत त्रिज्या प्रात करने के लिए भी सूत्र दिए हैं।

त्रिभुज का क्षेत्रफल :-
त्रिभुज का क्षेत्रफल प्राप्त करने के लिए उन्होंने यह सूत्र दिया —
त्रिभुज के भुजाओं के योग को त्रिभुज के परिवृत त्रिज्या के चार गुणा से विभाजित करने से प्राप्त होता है।
अंकपाश, मत्स्य मेरु, इत्यादि विषयों पर कार्य किया है।

~ जादूई-वर्ग —
इस विषय पर आपने
पद्मा हर छोटे वर्ग के चार पत्रों में 8 संख्या इस प्रकार रखें कि कुल योग 132 हो ,
वाजरा में 8 संख्या को एक ही काॅलम में प्रत्येक वर्ग ऊर्ध विकर्ण में इस प्रकार रखें कि योग 132 हो,
शादसरा (षट्भुज) हर समूह में 8 संख्या इस प्रकार है कि कुल योग 294 है।
इस तरह की अनेक जादूई-वर्ग का निर्माण बहुत ही सुन्दरता से आपने "भद्र-गणित" में किया है।
आपके द्वारा तैयार किया गया एल्गोरिदम का प्रयोग गणित के साथ साथ कम्प्यूटर के प्रोग्रामिंग लैंग्वेज C, C++ में किया जाता है।

।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
(Person after Perfection becomes Personality)
Wabesite :- www.ManasGanit.com
Facebook :- anilkumar3012@yahoo.com
Twitter /Google + :- akt1974.at@gmail.com
Blog :- ManasGanit.blogspot.co.in
Mail at :- mg.vm3012@gmail.com,
manasgvm3012@gmail.com

नोट :- उपरोक्त विषय व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है,
          अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों,
          ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा    
          अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया
          गया है।

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Monday, 14 January 2019

वराहमिहिर (Varahmihir)

 January 14, 2019     भारतीय गणितज्ञ     No comments   

।। वराह मिहिर।।
(जन्म-ईस्वी 499- मृत्यु ईस्वी सन् 587) :वराह मिहिर का जन्म उज्जैन के समीप कपिथा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम आदित्यदास था। उन्होंने उनका नाम ‍मिहिर रखा था जिसका अर्थ सूर्य होता है, क्योंकि उनके पिता सूर्य के उपासक थे। इनके भाई का नाम भद्रबाहु था। पिता ने मिहिर को भविष्य शास्त्र पढ़ाया था। मिहिर ने राजा विक्रमादित्य द्वितीय के पुत्र की मृत्यु 18 वर्ष की आयु में होगी, इसकी सटीक भविष्यवाणी कर दी थी।
राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने बुलाकर उनकी परीक्षा ली और फिर उनको अपने दरबार के रत्नों में स्थान दिया। इस तरह विक्रमादित्य द्वितीय के नौ रत्न हो गए थे। मिहिर ने खगोल और ज्योतिष शास्त्र के कई सिद्धांत को गढ़ा और देश में इस विज्ञान को आगे बढ़ाया। इस योगदान के चलते राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने मिहिर को मगध देश का सर्वोच्च सम्मान 'वराह' प्रदान किया था। उसी दिन से उनका नाम वराह मिहिर हो गया।
योगदान :-
वराह मिहिर ही पहले आचार्य हैं जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को सि‍द्धांत, संहिता तथा होरा के रूप में स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया। इन्होंने तीनों स्कंधों के निरुपण के लिए तीनों स्कंधों से संबद्ध अलग-अलग ग्रंथों की रचना की। सिद्धांत (‍गणित)-स्कंध में उनकी प्रसिद्ध रचना है- पंचसिद्धांतिका, संहितास्कंध में बृहत्संहिता तथा होरास्कंध में बृहज्जातक मुख्य रूप से परिगणित हैं।
कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था। इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था। इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है। इसके आसपास 27 नक्षत्रों के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराह मिहिर की देखरेख में बनाया गया था।
अज्ञात बल :आर्यभट्ट के प्रभाव के चलते वराह मिहिर की ज्योतिष से खगोल शास्त्र में भी रु‍चि हो गई थी। आर्यभट्ट वराह मिहिर के गुरु थे। आर्यभट्ट की तरह वराह मिहिर का भी कहना था कि पृथ्वी गोल है। विज्ञान के इतिहास में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि सभी वस्तुओं का पृथ्वी की ओर आकर्षित होना किसी अज्ञात बल का आभारी है। सदियों बाद 'न्यूटन' ने इस अज्ञात बल को 'गुरुत्वाकर्षण बल' नाम दिया। 
खगोलीय गणित और फलित ज्योतिष के ज्ञाता वराह मिहिर का ज्ञान 3 भागों में बांटा जा सकता है- 1. खगोल, 2. भविष्य विज्ञान और 3. वृक्षायुर्वेद। इनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'वृहत्संहिता' तथा 'पंचसिद्धांतिका' हैं। उन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक नामक ग्रंथ भी लिखे हैं।
वृहत्संहिता :वृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्रम्, प्राकृतिक इतिहास, भौतिक भूगोल जैसे विषयों पर वर्णन है। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन निर्माण कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय भी सम्मिलित हैं। 
पंचसिद्धांतिका :पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित 5 सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं- पोलिश, रोमक, वसिष्ठ, सूर्य तथा पितामह। वराहमिहिर ने इन पूर्व प्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से बीज नामक संस्कार का भी निर्देश किया है।
गणितीय योगदान :-
(1) त्रिलोष्टक प्रस्तार (Triloshtaka Prastar) :- किसी भी द्विघात बहुपद के nवें घात (x + y)ⁿ  के विभिन्न पदों के गुणक प्राप्त करने के लिए त्रिलोष्टक विधि दिया जिसे बाद में मेरु-प्रस्तार तथा वर्तमान आधुनिक गणित में पास्कल ट्रैंगल के नाम से जाना जाता है।
उन्हीं की सूत्रों को आधार बनाकर जैन गणितज्ञों ने यह सूत्र दिया —
C (n r) = n (n-1)(n-2)(n-3).... (n-r+1) / r!
उन्होंने C(n r) को इस प्रकार लिखा -
1
1  1
1  2  1
1  3   3  1
1  4   6    4   1
1  5  10  10  5   1

(2) त्रिकोणमिति (Trigonometry) :- वराहमिहिर ने आर्यभट्ट प्रथम द्वारा दिए गए Sine टेवल को और अधिक सटीक (accurate) बनाया जिसमें वराहमिहिर ने त्रिज्या R = 120' लिया जबकि आर्यभट्ट प्रथम ने त्रिज्या R = 3438' लिया था। उन्होंने त्रिकोणमिति के कई सूत्र दिए जो आधुनिक संकेतों के आधार पर इस प्रकार है —
(i) Sin X = Cos (90° - X)
(ii) Sin²X + Cos²X = 1
(iii) (1- Cos²X) / 2 = Sin²X

(3) खगोल शास्त्र (Astronomy) :- खगोल शास्त्र में विषुव (equinox) समय के उस क्षण को कहते हैं जिसके आधार पर किसी खगोलीय निर्देशांक प्रणाली (celestial coordinate system) के तत्वों की परिभाषा की जाती है। इसका मान वराहमिहिर ने 50.32 चाप सेकेन्ड (arc second) लिया जो आधुनिक मान 50.29  चाप सेकेन्ड (arc second) के काफी सन्निकट है। उन्होंने यह परीक्षण किया कि सूर्य के श्वेत प्रकाश सात रंगों से बना है तथा इन्द्रधनुष जैसी खगोलीय घटना का भी विश्लेषण किया। उन्होंने सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण आदि घटनाओं का भी विश्लेषण किया। एक साल में 365 दिन, 14 घटिका तथा 48 पल होत है यह भी उन्ही की खोज का हिस्सा है।
(4) जादूई वर्ग (Magic Square) :- वराहमिहिर ने 4 × 4 के जादुई वर्ग पर कार्य किया जिसमें सभी स्थिति में संख्याओं का योग 18 है जिसे उन्होंने "सर्वतोभद्रा" नाम दिया।
भारतीय गणित तथा ज्ञान-विज्ञान को समृद्ध करने में वराहमिहिर का योगदान अतुलनीय है।

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