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Thursday, 24 November 2016

।। पहाड़ा 2 से 20 तक।।

 November 24, 2016     39 comments   

।। पहाड़ा - 2।।
- 2 × 1 = 2,  दो एकम् दो ( २)
- 2 × 2 = 4,  दो दूनी चार ( ४)
- 2 × 3 = 6,  दो तीया छे ( ६)
- 2 × 4 = 8,  दो चौके आठ ( ८)
- 2 × 5 = 10, दो पंजे दस ( १०)
- 2 × 6 = 12, दो छक बारह ( १२)
- 2 × 7 = 14, दो सते चौदह ( १४)
- 2 × 8 = 16, दो अठे सोलह ( १६)
- 2 × 9 = 18, दो नीयम अठारह ( १८)
- 2 × 10 = 20, दो दाहम बीस ( २०)

   ।। पहाड़ा - 3 ।।
- 3 × 1 = 3, तीन एकम् तीन ( ३)
- 3 × 2 = 6, तीन दूनी छः ( ६)
- 3 × 3 = 9, तीन तीया नौ ( ९)
- 3 × 4 = 12, तीन चौक बारह ( १२)
- 3 × 5 = 15, तीन पचे पन्द्रह ( १५)
- 3 × 6 = 18, तीन छके अठारह ( १८)
- 3 × 7 = 21, तीन सते इक्कीस ( २१)
- 3 × 8 = 24, तीन अठे चौबीस ( २४)
- 3 × 9 = 27, तीन नीयम् सत्ताइस ( २७)
- 3 × 10 = 30, तीन दाहम् तीस ( ३०)

।। पहाड़ा - 4 ।।
- 4 × 1 = 4, चार एकम् चार ( ४)
- 4 × 2 = 8, चार दूनी आठ ( ८)
- 4 × 3 = 12, चार तीया बारह ( १२)
- 4 × 4 = 16, चार चौका सोलह ( १६)
- 4 × 5 = 20, चार पंचे बीस ( २०)
- 4 × 6 = 24, चार छक चौबीस ( २४)
- 4 × 7 = 28, चार सते अठ्ठाइस ( २८)
- 4 × 8 = 32, चार अठे बत्तीस ( ३२)
- 4 × 9 = 36, चार नीयम् छत्तीस ( ३६)
- 4 × 10 = 40, चार दाहम् चालीस ( ४०)

।। पहाड़ा - 5 ।।
- 5 × 1 = 5, पाँच एकम् पाँच ( ५)
- 5 × 2 = 10, पाँच दूनी दस ( १०)
- 5 × 3 = 15, पाँच तीया पन्द्रह ( १५)
- 5 × 4 = 20, पाँच चौका बीस ( २०)
- 5 × 5 = 25, पाँच पचे पच्चीस ( २५)
- 5 × 6 = 30, पाँच छके तीस ( ३०)
- 5 × 7 = 35, पाँच सते पैंतीस ( ३५)
- 5 × 8 = 40, पाँच अठे चालीस ( ४०)
- 5 × 9 = 45, पाँच नीयम् पैंतालीस ( ४५)
- 5 × 10 = 50, पाँच दाहम् पचास ( ५०)

।। पहाड़ा - 6 ।।
- 6 × 1 = 6, छः एकम् छः ( ६)
- 6 × 2 = 12, छः दूनी बारह ( १२)
- 6 × 3 = 18, छः तीया अठारह ( १८)
- 6 × 4 = 24, छः चौक चौबीस ( २४)
- 6 × 5 = 30, छः पँचे तीस ( ३०) 
- 6 × 6 = 36, छः छके छत्तीस ( ३६)
- 6 × 7 = 42, छः सते बयालीस ( ४२)
- 6 × 8 = 48, छः अठे अड़तालीस ( ४८)
- 6 × 9 = 54, छः नीयम् चौवन ( ५४)
- 6 × 10 = 60, छः दाहम् साठ ( ६०)

।। पहाड़ा - 7 ।।
- 7 × 1 = 7, सात एकम् सात ( ७)
- 7 × 2 = 14, सात दूनी चौदह ( १४)
- 7 × 3 = 21, सात तीया इक्कीस ( २१)
- 7 × 4 = 28, सात चौक अठाइस ( २८)
- 7 × 5 = 35, सात पँचे पैंतीस ( ३५)
- 7 × 6 = 42, सात छक बयालीस ( ४२)
- 7 × 7 = 49, सात सते उनचास ( ४९)
- 7 × 8 = 56, सात अठे छप्पन ( ५६)
- 7 × 9 = 63, सात नीयम् तिरेसठ ( ६३)
- 7 × 10 = 70, सात दाहम् सत्तर ( ७०)

।। पहाड़ा - 8 ।।
- 8 × 1 = 8, आठ एकम् आठ ( ८)
- 8 × 2 = 16, आठ दूनी सोलह ( १६)
- 8 × 3 = 24, आठ तीया चौबीस ( २४)
- 8 × 4 = 32, आठ चौके बत्तीस ( ३२)
- 8 × 5 = 40, आठ पंचे चालीस ( ४०)
- 8 × 6 = 48, आठ छक अड़तालीस ( ४८)
- 8 × 7 = 56, आठ सते छप्पन ( ५६)
- 8 × 8 = 64, अाठ अठे चौसठ ( ६४)
- 8 × 9 = 72, आठ नीयम् बहत्तर ( ७२)
- 8 × 10 = 80, आठ दाहम् अस्सी ( ८०)

।। पहाड़ा - 9 ।।
- 9 × 1 = 9, नौ एकम् नौ ( ९)
- 9 × 2 = 18, नौ दूनी अठारह ( १८) 
- 9 × 3 = 27, नौ तीया सत्ताइस ( २७)
- 9 × 4 = 36, नौ चौक छत्तीस ( ३६)
- 9 × 5 = 45, नौ पचे पैंतालीस ( ४५)
- 9 × 6 = 54, नौ छके चौवन ( ५४)
- 9 × 7 = 63, नौ सते तिरेसठ ( ६३)
- 9 × 8 = 72, नौ अठे बहत्तर ( ७२) 
- 9 × 9 = 81, नौ नीयम् एकासी ( ८१)
- 9 × 10 = 90, नौ दाहम् नब्बे ( ९०)

।। पहाड़ा - 10 ।।
- 10 × 1 = 10, दश एकम् दश (१०)
- 10 × 2 = 20, दश दूनी बीस ( २०)
- 10 × 3 = 30, दश तीया तीस ( ३०)
- 10 × 4 = 40, दश चौक चालीस ( ४०)
- 10 × 5 = 50, दश पचे पचास ( ५०)
- 10 × 6 = 60, दश छक साठ ( ६०)
- 10 × 7 = 70, दश सते सत्तर ( ७०)
- 10 × 8 = 80, दश अठे अस्सी ( ८०)
- 10 × 9 = 90, दश नीयम् नब्बे ( ९०)
- 10 × 10 = 100, दश दाहम् सौ ( १००)

।। पहाड़ा - 11 ।।
- 11 × 1 = 11, ग्यारह एकम् ग्यारह ( ११)
- 11 × 2 = 22, ग्यारह दूनी बाइस ( २२)
- 11 × 3 = 33, ग्यारह तीया तैतीस ( ३३)
- 11 × 4 = 44, ग्यारह चौके चौवालीस ( ४४)
- 11 × 5 = 55, ग्यारह पँचे पचपन ( ५५)
- 11 × 6 = 66, ग्यारह छके छियासठ ( ६६)
- 11 × 7 = 77, ग्यारह सते सतहत्तर ( ७७)
- 11 × 8 = 88, ग्यारह अठे अठासी ( ८८)
- 11 × 9 = 99, ग्यारह नीयम् निन्यानवे ( ९९)
- 11 × 10 = 110, ग्यारह दाहम् एक सौ दस ( ११०)

।। पहाड़ा - 12 ।।
- 12 × 1 = 12, बारह एकम् बारह ( १२)
- 12 × 2 = 24, बारह दूनी चौबीस ( २४)
- 12 × 3 = 36, बारह तीया छत्तीस (३६)
- 12 × 4 = 48, बारह चौके अड़तालीस ( ४८)
- 12 × 5 = 60, बारह पँचे साठ ( ६०)
- 12 × 6 = 72, बारह छके बहत्तर ( ७२)
- 12 × 7 = 84, बारह सते चौरासी ( ८४)
- 12 × 8 = 96, बारह अठे छियानवे ( ९६)
- 12 × 9 = 108, बारह नीयम् एक सौ आठ ( १०८)
- 12 × 10 = 120, बारह दाहम् एक सौ बीस ( १२०)

।। पहाड़ा - 13 ।।
- 13 × 1 = 13, तेरह एकम् तेरह ( १३)
- 13 × 2 = 26, तेरह दूनी छब्बीस ( २६)
- 13 × 3 = 39, तेरह तीया उनचालीस (३९)
- 13 × 4 = 52, तेरह चौके बाबन ( ५२)
- 13 × 5 = 65, तेरह पँचे पैंसठ ( ६५) 
- 13 × 6 = 78, तेरह छके अट्ठत्तर ( ७८)
- 13 × 7 = 91, तेरह सते एकानवे ( ९१)
- 13 × 8 = 104, तेरह अठे एक सौ चार ( १०४)
- 13 × 9 = 117, तेरह नीयम् एक सौ सत्रह (११७)
- 13 × 10 = 130, तेरह दाहम् एक सौ तीस (१३०)

।। पहाड़ा - 14 ।।
- 14 × 1 = 14, चौदह एकम् चौदह ( १४)
- 14 × 2 = 28, चौदह दूनी अट्ठाइस (२८)
- 14 × 3 = 42, चौदह तीया बयालीस (४२)
- 14 × 4 = 56, चौदह चौका छप्पन ( ५६)
- 14 × 5 = 70, चौदह पँचे सत्तर ( ७०)
- 14 × 6 = 84, चौदह छके चौरासी (८४)
- 14 × 7 = 98, चौदह सते अट्ठानवे (९८)
- 14 × 8 = 112, चौदह अठे एक सौ बारह (११२)
-14 × 9 = 126, चौदह नीयम् एक सौ छब्बीस (१२६)
- 14 × 10 = 140, चौदह दाहम् एक सौ चालीस (१४०)

।। पहाड़ा - 15 ।।
- 15 × 1 = 15, पन्द्रह एकम् पन्द्रह (१५)
- 15 × 2 = 30, पन्द्रह दूनी तीस (३०)
- 15 × 3 = 45, तीये पैंतालीस (४५)
- 15 × 4 = 60, चौके साठ ( ६०)
- 15 × 5 = 75, दाम पचहत्तर (७५)
- 15 × 6 = 90, छक्के नब्बे (९०)
- 15 × 7 = 105, पन्द्रह सते एक सौ पाँच ( १०५)
- 15 × 8 = 120, अट्ठे बीसा ( १२०)
- 15 × 9 = 135, नाम् पैंतीसा ( १३५)
- 15 × 10 = 150, पन्द्रह दाहम् डेढ़ सौ ( १५०)

।। पहाड़ा - 16 ।।
- 16 × 1 = 16, सोलह एकम् सोलह (१६)
- 16 × 2 = 32, सोलह दूनी बत्तीस (३२)
- 16 × 3 = 48, सोलह तीया अड़तालीस (४८)
- 16 × 4 = 64, सोलह चौके चौसठ ( ६४)
- 16 × 5 = 80, सोलह पँचे अस्सी (८०)
- 16 × 6 = 96, सोलह छके छियानवे ( ९६)
- 16 × 7 = 112, सोलह सते एक सौ बारह (११२)
- 16 × 8 = 128, सोलह अट्ठे एक सौ अट्ठाइस (१२८)
- 16 × 9 = 144, सोलह नीयम् एक सौ चौवालीस (१४४)
- 16 × 10 = 160, सोलह दाहम् एक सौ साठ (१६०)

।। पहाड़ा - 17 ।।
- 17 × 1 = 17, सत्रह एकम् सत्रह (१७)
- 17 × 2 = 34, सत्रह दूनी चौंतीस (३४)
- 17 × 3 = 51, सत्रह तीया इक्यावन (५१)
- 17 × 4 = 68, सत्रह चौका अड़सठ (६८)
- 17 × 5 = 85, सत्रह पँचे पचासी (८५)
- 17 × 6 = 102, सत्रह छके एक सौ दो (१०२)
- 17 × 7 = 119, सत्रह सते एक सौ उन्नीस (११९)
- 17 × 8 = 136, सत्रह अठे छत्तील सै (१३६)
- 17 × 9 = 153, सत्रह नीयम् तिरपन्ना सै (१५३)
- 17 × 10 = 170, सत्रह दाहम् एक सौ सत्तर (१७०)

।। पहाड़ा - 18 ।।
- 18 × 1 = 18, अठारह एकम् अठारह (१८)
- 18 × 2 = 36, अठारह दूनी छत्तीस (३६)
- 18 × 3 = 54, अठारह तीया चौवन (५४)
- 18 × 4 = 72, अठारह चौक बहत्तर (७२)
- 18 × 5 = 90, अठारह पँचे नब्बे (९०)
- 18 × 6 = 108, अठारह छके एक सौ आठ (१०८)
- 18 × 7 = 126, अठारह सते छबील सै (१२६)
- 18 × 8 = 144, अठारह अठे चौवाल सै (१४४)
- 18 × 9 = 162, अठारह नीयम् बसट्ठा सै (१६२)
- 18 × 10 = 180, अठारह दाहम् एक सौ अस्सी (१८०)

।। पहाड़ा - 19।।
- 19 × 1 = 19, उन्नीस एकम् उन्नीस (१९)
- 19 × 2 = 38, उन्नीस दूनी अड़तीस (३८)
- 19 × 3 = 57, उन्नीस तीया सत्तावन (५७)
- 19 × 4 = 76, उन्नीस चौक छिहत्तर (७६)
- 19 × 5 = 95, उन्नीस पँचे पँनचानवे (९५)
- 19 × 6 = 114, उन्नीस छके चौदांहा सै (१४४)
- 19 × 7 = 133, उन्नीस सते तैतील सै (१३३)
- 19 × 8 = 152, उन्नीस अठे बबना सै ( १५२)
- 19 × 9 = 171, उन्नीस नीयम् एकहंतरु सै (१७१)
- 19 × 10 =190, उन्नीस दाहम् एक सौ नब्बे (१९०)

।। पहाड़ा - 20 ।।
- 20 × 1 = 20, बीस एक बीस (२०)
- 20 × 2 = 40, बीस दूनी चालीस ( ४०)
- 20 × 3 = 60, बीस तीया साठ (६०)
- 20 × 4 = 80, बीस चौके अस्सी (८०)
- 20 × 5 = 100, बीस पँचे सौ (१००)
- 20 × 6 = 120, बीस छके बीसा सै (१२०)
- 20 × 7 = 140, बीस सते एक सौ चालीस (१४०)
- 20 × 8 = 160, बीस अठे साठ सै (१६०)
- 20 × 9 = 180, बीस नीयम् असीया सै (१८०)
- 20 × 10 = 200, बीस दाहम् दो सौ (२००)

।। चौथाई (¼) का पहाड़ा।।
¼ × 1 = ¼      (चौथाई एकम चौथाई)
¼ × 2 = ½      (चौथाई दुनि आधा)
¼ × 3 = ¾      (चौथाई तीया पौन)
¼ × 4 = 1       (चौथाई चोके एक)
¼ × 5 = 1¼    (चौथाई पँचे सवा)
¼ × 6 = 1½    (चौथाई छके ढाई)
¼ × 7 = 1¾    (चौथाई सत्ते पोने दो)
¼ × 8 = 2       (चौथाई अठे दो)
¼ × 9 = 2¼    (चौथाई नीयम सवा दो)
¼ × 10 = 2½  (चौथाई दाहम ढाई)

।। आधा (½) का पहाड़ा।।
½ × 1 = ½ आधा एकम आधा)
½ × 2 = 1     (आधा दुनी एक)
½ × 3 = 1½  (आधा तीया डेढ़)
½ × 4 = 2     (आधा चौका दो)
½ × 5 = 2½  (आधा पंजे ढ़ाई)
½ × 6 = 3     (आधा छके तीन)
½ × 7 = 3½  (आधा सत्ते साढ़े तीन)
½ × 8 = 4     (आधा अठे चार)
½ × 9 = 4½  (आधा नीयम साढ़े चार)
½ × 10 = 5   (आधा दांहम पांच)

।। पौन (¾) का पहाड़ा।।
¾ × 1 = ¾      (पौना एकम पौना)
¾ × 2 = 1½    (पौना दुनी डेढ़)
¾ × 3 = 2¼    (पौना तीय सवा दो)
¾ × 4 = 3       (पौना चौका तीन)
¾ × 5 = 3¾    (पौना पंजे पौने चार)
¾ × 6 = 4½    (पौना छके साढ़े चार)
¾ × 7 = 5¼    (पौना सत्ते सवा पांच)
¾ × 8 = 6       (पौना अट्ठे छः)
¾ × 9 = 6¾    (पौना नीयम पौने सात)
¾ × 10 = 7½  (पौना दाहम साढ़े सात)

।। सवैया - सवा (1¼) का पहाड़ा।।
1¼ × 1 = 1¼      (सवा एकम सवा)
1¼ × 2 = 2½      (सवा दुनी ढ़ाई)
1¼ × 3 = 3¾      (सवा तीया पौने चार)
1¼ × 4 = 5         (सवा चौके पांच)
1¼ × 5 = 6¼      (सवा पंजे सवा छः)
1¼ × 6 = 7½      (सवा छके साढ़े सात)
1¼ × 7 = 8¾      (सवा सत्ते पौने नौ)
1¼ × 8 = 10       (सवा अट्ठे दस)
1¼ × 9 = 11¼    (सवा नीयम सवा ग्यारह)
1¼ × 10 = 12½ (सवा दाहम साढ़े बारह)

।। ड्योढ़ा - डेढ़ (1½) का पहाड़ा।।
1½ × 1 = 1½   (डेढ़ एकम डेढ़)
1½ × 2 = 3      (डेढ़ दुनी तीन)
1½ × 3 = 4½   (डेढ़ तीया साढ़े चार)
1½ × 4 = 6      (डेढ़ चौके छः)
1½ × 5 = 7½   (डेढ़ पंजे साढ़े सात)
1½ × 6 = 9      (डेढ़ छका नौ)
1½ × 7 = 10½ (डेढ़ सत्ते साढ़े दस)
1½ × 8 = 12    (डेढ़ अट्ठे बारह)
1½ × 9 = 13½ (डेढ़ नीयम साढ़े तेरह)
1½ × 10 = 15  (डेढ़ दाहम पंद्रह)

  ।। इति श्री।।

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Saturday, 5 November 2016

।। देवनागरी लिपि - वैज्ञानिकता।।

 November 05, 2016     No comments   

।। हिंदी - वैज्ञानिक भाषा।।
संस्कृत तथा हिंदी समान लिपि में लिखे जाने के कारण दोनों की वैज्ञानिकता अद्भुत है इस भाषा के सभी वर्ण अपनी विशेषता के कारण शोध का विषय है जो अपने आसमान सी विशालता तथा महासागर सी गहराई है
इस भाषा सभी वर्ण-वर्ग के उच्चारण स्थान तथा स्वर के हर्स्व तथा दिर्घता से युक्त शब्द के भाव परिवर्तित होते रहते हैं —
क - वर्ग
क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के समय
ध्वनि
कंठ से निकलती है।
एक बार बोल कर देखिये |
च - वर्ग
च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ तालू से लगती है।
एक बार बोल कर देखिये |

ट - वर्ग
ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए,
क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है।
एक बार बोल कर देखिये |

त - वर्ग
त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ दांतों से लगती है।
एक बार बोल कर देखिये |

प - वर्ग
प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए,
क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के मिलने पर ही होता है।
एक बार बोल कर देखिये ।
इसके अलावा स्वर में हर्स्व तथा दीर्घ होना -
हर्स्व स्वर —
अ, इ, उ, ए, ओ
दीर्घ स्वर —
आ, ई, ऊ, ऐ, औ

*क,ख,ग क्या कहता है जरा गौर करें....

क - क्लेश मत करो
ख- खराब मत करो
ग- गर्व ना करो
घ- घमण्ड मत करो
च- चिँता मत करो
छ- छल-कपट मत करो
ज- जवाबदारी निभाओ
झ- झूठ मत बोलो
ट- टिप्पणी मत करो
ठ- ठगो मत
ड- डरपोक मत बनो
ढ- ढोंग ना करो
त- तैश मे मत रहो
थ- थको मत
द- दिलदार बनो
ध- धोखा मत करो
न- नम्र बनो
प- पाप मत करो
फ- फालतू काम मत करो
ब- बिगाङ मत करो
भ- भावुक बनो
म- मधुर बनो
य- यशश्वी बनो
र- रोओ मत
ल- लोभ मत करो
व- वैर मत करो
श- शत्रुता मत करो
ष- षटकोण की तरह स्थिर रहो
स- सच बोलो
ह- हँसमुख रहो
क्ष- क्षमा करो
त्र- त्रास मत करो
ज्ञ- ज्ञानी बनो !!
हम अपनी भाषा पर गर्व करते हैं क्योंकि इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा मे नही है

।।सधन्यवाद।।

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Monday, 24 October 2016

।। सत्संग - डाकू से संत।।

 October 24, 2016     No comments   

आखिर एक डाकू कैसा बना रामायण का रचयिता

बहुत समय पहले की बात है किसी राज्य में एक बड़े ही खूंखार डाकू का भय व्याप्त था। उस डाकू  का नाम रत्नाकर था। वह अपने साथियों के साथ जंगल से गुजर रहे राहगीरों को लूटता और विरोध करने पर उनकी हत्या भी कर देता।
एक बार देवऋषि नारद भी उन्ही जंगलों से भगवान का जप करते हुए जा रहे थे। जब वे घने बीहड़ों में पहुंचे तभी उन्हें कुछ लोग विपरीत दिशा में भागते हुए दिखे।
देवऋषि ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो सभी ने मार्ग में रत्नाकर के होने की बात बतायी। पर बावजूद इसके देवऋषि आगे बढ़ने लगे।
क्या आपको भय नहीं लगता ?, भाग रहे लोगों ने उन्हें ऐसा करते देख पूछा।
नहीं, मैं मानता ही नहीं की मेरे आलावा यहाँ कोई और है, और भय तो हमेशा किसी और के होने से लगता है, स्वयं से नहीं। ऋषि ने ऐसा कहते हुए अपने कदम आगे बढ़ा दिए।
कुछ ही दूर जाने पर  डाकू  रत्नाकर अपने साथियों के साथ उनके समक्ष आ पहुंचा।
रत्नाकर – नारद, मैं रत्नाकर हूँ, डाकू  रत्नाकर।
नारद मुस्कुराते हुए बोले – मैं नारद हूँ देवऋषि नारद, तुम्हारा अतिथि और मैं निर्भय हूँ। क्या तुम निर्भय हो ?
रत्नाकर – क्या मतलब है तुम्हारा ?
नारद – ना मुझे प्राणो का भय है, ना असफलता का, ना कल का ना कलंक का, और कोई भय है जो तुम जानते हो ? अब तुम बताओ क्या तुम निर्भय हो ?
रत्नाकर – हाँ, मैं निर्भय हूँ, ना मुझे प्राणो का भय है, ना असफलता का, ना कल का ना कलंक का।
नारद – तो तुम यहाँ इन घने जंगलों में छिप कर क्यों रहते हो ? क्या राजा से डरते हो ?
रत्नाकर – नहीं !
नारद – क्या प्रजा से डरते हो ?
रत्नाकर- नहीं !
नारद- क्या पाप से डरते हो ?
रत्नाकर – नहीं !
नारद – तो यहाँ छिप कर क्यों रहते हो ?
यह सुनकर रत्नाकर घबरा गया और एकटक देवऋषि को घूरने लगा।
नारद – उत्तर मैं देता हूँ। तुम पाप करते हो और पाप से डरते हो।
रत्नाकर हँसते हुए बोला – नारद तुम अपनी इन बातों से मुझे भ्रमित नहीं कर सकते। ना मैं पाप से डरता हूँ, ना पुण्य से, ना देवताओं से ना दानवों से, ना राजा से ना राज्य से, ना दंड से ना विधान से। मैंने राज्य के साथ द्रोह किया है, मैंने समाज के साथ द्रोह किया है, इसलिए मैं यहाँ इन बीहड़ों में रहता हूँ। ये प्रतिशोध है मेरा।
नारद – क्या था वो पाप जिससे तुम डरते हो ?
रत्नाकर- मुझे इतना मत उकसाओ की मैं तुम्हारी हत्या कर दूँ नारद। इतना तो मैं जान ही चुका हूँ कि पाप और पुण्य की परिभाषा हमेशा ताकतवर तय करते हैं और उसे कमजोरों पर थोपते हैं। मैंने साम्राज्यों का विस्तार देखा है, हत्या से, बल से, छल से, मैंने वाणिज्य का विस्तार देखा है, कपट से, अनीति से, अधर्म से, वो पाप नहीं था? मैं सैनिक था, दुष्ट और निर्दयी सौदागरों की भी रक्षा की… वो पाप नहीं था? युद्ध में हारे हुए लोगों की स्त्रियों के साथ पशुता का व्यवहार करने वाले सैनिकों की हत्या क्या की मैंने, मैं पापी हो गया? राजा, सेना और सेनापति का अपराधी हो गया मैं। क्या वो पाप था?
नारद – दूसरों का पाप अपने पाप को सही नहीं ठहरा सकता रत्नाकर।
रत्नाकर चीखते हुए – मैं पापी नहीं हूँ।
नारद – कौन निर्णय करेगा ? वो जो इस यात्रा में तुम्हारे साथ हैं या नहीं हैं? क्या तुम्हारी पत्नी, तुम्हारा पुत्र, इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ?
रत्नाकर – हाँ, वो क्यों साथ नहीं होंगे, मैं जो ये सब करता हूँ, उनके सुख के लिए ही तो करता हूँ। तो जो तुम्हारे साथ हैं उन्ही को निर्णायक बनाते हैं। जाओ, अपनी पत्नी से, अपने पुत्र से, अपने पिता से, अपने निकट सम्बन्धियों से पूछ कर आओ, जो तुम कर रहे हो, क्या वो पाप नहीं है, और क्या वे सब इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ? इस पाप के भागीदार हैं ?
रत्नाकर – ठीक है मैं अभी जाकर लौटता हूँ।
और अपने साथियों को नारद को बाँध कर रखने का निर्देश देकर रत्नाकर सीधा अपनी पत्नी के पास जाता है और उससे पूछता है – ये मैं जो कर रहा हूँ, क्या वो पाप है? क्या तुम इस पाप में मेरी भागीदार हो?
पत्नी कहती है,  नहीं स्वामी, मैंने आपके सुख में, दुःख में साथ देने की कसम खाई है, आपके पाप में भागीदार बनने की नहीं।
यह सुन रत्नाकर स्तब्ध रह जाता है।  फिर वह अपने अंधे पिता के समक्ष यही प्रश्न दोहराता है, पिताजी, ये जो मैं कर रहा हूँ, क्या वो पाप है? क्या आप इस पाप में मेरी भागीदार हैं ?
पिताजी बोलते हैं, नहीं पुत्र, ये तो तेरी कमाई है, इसे मैं कैसे बाँट सकता हूँ।
यह सुनते ही मानो रत्नाकर पर बिजली टूट पड़ती है। वह बेहद दुखी हो जाता है और धीरे – धीरे चलते हुए वापस देवऋषि नारद के पास पहुँच जाता है।
नारद- तुम्हारे साथी मुझे अकेला छोड़ जा चुके हैं रत्नाकर।
रत्नाकर, देवऋषि के चरणो में गिरते हुए – क्षमा देवऋषि क्षमा, अब तो मैं भी अकेला ही हूँ।
नारद – नहीं रत्नाकर, तुम्ही अपने मित्र, और तुम्ही अपने शत्रु हो, तुम्हारे पुराने संसार की रचना भी तुम्ही ने की थी..तुम्हारे नए संसार की रचना भी तुम्ही करोगे। इसलिए उठो और अपने पुरुषार्थ से अपना भविष्य लिखो…. राम-राम, तुम्हारा पथ शुभ हो।
इस घटना के पश्चात डाकू रत्नाकर का जीवन पूरी तरह बदल गया, उसने पाप के मार्ग को त्याग, पुण्य के मार्ग को अपनाया और आगे चलकर यही डाकू  राम-कथा का रचयिता महर्षि वाल्मीकि बना।

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।। विदुर के छः दर्शन।।

 October 24, 2016     No comments   

सिर्फ किस्मत वालों को मिलती हैं जिंदगी में ये 6 सौगात: महाभारत काल में बताया गया है
महात्मा विदुर जीवन दर्शन और राजनीति के महान ज्ञाता थे। विदुर नीति में मानव और राष्ट्र के कल्याण के लिए आवश्यक नियमों का संग्रह किया गया है।

विदुर ने ऐसी अनेक बातों के बारे में बताया है जो मनुष्य के दुख का कारण बनती हैं। वहीं उन्होंने ऐसी हिदायतों का जिक्र भी किया है जो हमें अनेक दुखों से बचाती हैं। जानिए विदुर के अनुसार जीवन की उन सौगातों के बारे में, जिन्हें प्राप्त करने वाला यकीनन बहुत भाग्यशाली होता है।

1– अगर किसी व्यक्ति के पास गुण हैं और जीवन जीने के लिए पर्याप्त धन भी है, तो वह मनुष्य भाग्यशाली है। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, उसका जीवन बहुत कष्टपूर्ण होता है। निर्धनता अत्यंत कष्टदायक होती है। अतः विदुर ने गुणों के साथ ही धन को भी जरूरी माना है।

2– अगर मनुष्य में गुण हों, धन भी हो लेकिन स्वास्थ्य अच्छा न हो तो उसका जीवन सुखमय नहीं माना जा सकता। निरोगी काया ही धन का सदुपयोग कर सकती है। वही सद्गुणों का जीवन में ठीक प्रकार से इस्तेमाल कर सकती है।

अगर शरीर ही स्वस्थ नहीं होगा तो मनुष्य जीवनभर रोगों से जूझता रहेगा। इस प्रकार वह न तो कल्याणकारी कार्य कर सकता है और न किसी का हित कर सकता है।

3– अगर पत्नी मनपसंद हो, रूपवती हो तो विदुर ने उस मनुष्य का जीवन सुखद माना है। हालांकि सिर्फ रूप ही सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं होती। गुणों का भी विशेष महत्व है। गुणरहित रूप सुखदायक नहीं होता।

4– विदुर ने सुंदर रूप के साथ ही एक और बात जोड़ी है- मधुर स्वभाव यानी मधुर वाणी बोलने वाली पत्नी। अगर पत्नी अपने पति से अच्छा बर्ताव न करे, तो उस घर में आए दिन विवादों की आशंका होती है। ऐसे घर में पति-पत्नी दोनों दुखी रहते हैं। अतः रूपवती होने के साथ ही मधुर व्यवहार भी सद्गुण है।

5– अगर कोई मनुष्य ऐसी विद्या जानता हो जिससे वह जीवन के लिए धन अर्जित कर सके तो वह बहुत भाग्यशाली है। वह स्वयं के बल पर अपना जीवन सुखपूर्वक चला सकता है। खुद का हुनर उसके लिए वरदान साबित हो सकता है, जिससे वह दूसरों पर आश्रित नहीं होता।

6– संतान का आज्ञाकारी होना, शुभ लक्षणों और गुणों से युक्त होना भी सौभाग्य की बात होती है। अगर स्वयं गुणवान, धनी और सज्जन हों तथा संतान व्यसन तथा अपव्यय करने वाली और दुष्ट हो तो उस व्यक्ति का जीवन अत्यंत दुखमय होता है।

इसलिए संतान को हमेशा शुभ संस्कार देने चाहिए। विदुर कहते हैं कि जिसकी संतान अच्छी है, वह बहुत ही सौभाग्यशाली होता है।

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।। नाव में लोकतंत्र।।

 October 24, 2016     No comments   

।। नाव में लोकतंत्र।।
एक समय की बात है एक राजा अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था । उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक महात्मा भी थे ।
.कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था ।
वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था ।
.नाव का मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी ।
वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा ।परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था ।
ऐसी स्थिति देखकर राजा भी गुस्से में था ।परंतु कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था ।नाव में बैठे महात्मा से रहा नहीं गया ।
वह राजा के पास गया और बोला - "महाराज ! अगर आप अनुमति दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ ।" राजा ने तत्काल अनुमति दे दी ।
महात्मा ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया । कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा । उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे । कुछ देर बाद महात्मा ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया ।
तत्पश्चात.......
वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया ।नाव के यात्रियों के साथ राजा को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ ।
राजा ने महात्मा से पूछा - "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था, अब देखो कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है ?"
महात्मा बोले - महाराज, "पानी की कद्र वही करता है जो कभी रेगिस्तान से गुजरा हो, खुद कष्ट का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है । इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी ।"
निष्कर्ष :-  भारत में रहकर भारत को गाली देने वाले कुत्तों के लिए समर्पित ....
वैधानिक चेतावनी :- उपरोक्त विषय का किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नहीं है यदि कोई संबंध मिलता है तो इसे महज एक संयोग कहा जायेगा....
सधन्यवाद

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।। कलावा (मौली) - एक विज्ञान।।

 October 24, 2016     No comments   

कलावा (मौली) क्यों बांधते हैं?
मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। इसे लोग कलावा भी कहते हैंl यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।
मौली का अर्थ : '
मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।
कैसी होती है मौली? :
मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।
कहां-कहां बांधते हैं मौली? :
मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।
मौली बांधने के नियम :
*शास्त्रों के अनुसार पुरुषों
एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।
*कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।
*मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।
कब बांधी जाती है मौली? :
*पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
*हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
*प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।
क्यों बांधते हैं मौली? :
* मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।
* किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
* किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।
* मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।
* किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।
* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
* इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।
मौली करती है रक्षा :
मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।
इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।
आध्यात्मिक पक्ष :
*शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।
*यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।
*इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।
*कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।
चिकित्सीय पक्ष :
प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।
हाथ में बांधे जाने का लाभ :
शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है।
कमर पर बांधी गई मौली :
कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।
मनोवैज्ञानिक लाभ :
मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।
सधन्यवाद।

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