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Tuesday, 12 September 2017

।। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)।।

 September 12, 2017     No comments   

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=850221778477565&id=518709388295474

।। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)।।

मिथक:-
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity) की खोज का श्रेय सर आइजक न्यूटन (1666 AD) को दिया है।

सत्यता:-
सर आइजक न्यूटन से लगभग हजारों वर्ष पूर्व ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force) पर कई  ग्रन्थों रचना हो गई थी।

(1)
यह ऋग्वेद के मन्त्र हैं :-

यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे ।
आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ।।
                  ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ३ )

अर्थात :-
सब लोकों का सूर्य्य के साथ आकर्षण और सूर्य्य आदि लोकों का परमेश्वर के साथ आकर्षण है । इन्द्र जो वायु , इसमें ईश्वर के रचे आकर्षण, प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं । उनसे सब लोकों का दिन दिन और क्षण क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर उधर विचल भी नहीं सकते ।

यदा सूर्य्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः ।
आदित्ते विश्वा भुवनानी येमिरे ।।३।।
                  ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ५ )

अर्थात :- हे परमेश्वर ! जब उन सूर्य्यादि लोकों को आपने रचा और आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने सामर्थ्य से उनका धारण कर रहे हैं , इसी कारण सूर्य्य और पृथिवी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे हैं । इन सूर्य्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है

(2)
ऋषि पिप्पलाद ( लगभग ६००० वर्ष पूर्व ) ने प्रश्न उपनिषद् में कहा :-
पायूपस्थे – अपानम् ।
                              ( प्रश्न उप० ३.४ )
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य० ।
                                            ( प्रश्न उप० ३.८ )
तथा पृथिव्याम् अभिमानिनी या देवता,
सैषा पुरुषस्य अपानवृत्तिम् आकृष्,
अपकर्षेन अनुग्रहं कुर्वती वर्तते ।
अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाशे वा उद्गच्छेत् । 
                                  (शांकर भाष्य, प्रश्न० ३.८ )
अर्थात :- अपान वायु के द्वारा ही मल मूत्र नीचे आता है । पृथिवी अपने आकर्षण शक्ति के द्वारा ही मनुष्य को रोके हुए है, अन्यथा वह आकाश में उड़ जाता ।

(3)
वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा :-
पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः ।
खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।  
                                                        (पंच०पृ०३१ )
अर्थात :- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथिवी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।

(4)
महर्षि पतञ्जली (150 ई० पूर्व) व्याकरण महाभाष्य में भी गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा :-

लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारोहति ।
पृथिवीविकारः पृथिवीमेव गच्छति आन्तर्यतः ।।  
     (महाभाष्य :- स्थानेन्तरतमः,१/१/४९ सूत्र पर )

अर्थात् :- पृथिवी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है । वह पृथिवी का विकार है, इसलिये पृथिवी पर ही आ जाता है ।

(5)
आचार्य श्रीपति ने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में कहा है :-
उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।
                                          (सिद्धान्त० १५/२१ )

नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।। ( सिद्धान्त० १५/२२ )

अर्थात :- पृथिवी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथिवी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

(6)
भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इनका जन्म 1114 ई. में हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे। यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। जब इन्होंने "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक ग्रन्थ लिखा तब वें मात्र 36 वर्ष के थे। "सिद्धान्त शिरोमणि" एक विशाल ग्रन्थ है।
जिसके चार भाग हैं
(1) लीलावती (2) बीजगणित (3) गोलाध्याय और (4) ग्रह गणिताध्याय।
लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। अपनी पुत्री के नाम पर ही उन्होंने पुस्तक का नाम लीलावती रखा। यह पुस्तक पिता-पुत्री संवाद के रूप में लिखी गयी है लीलावती में बड़े ही सरल (simple) और काव्यात्मक (poetic) तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है—
"आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं,
                             गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति,
                           समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।"
     (~ सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश)

अर्थात्—
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति ( Attractions force of the earth) है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

सुझाव:-
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम को ऋग्वेद, ऋषि पिप्लाद, वराहमिहीर, महाऋषि पातंजली तथा भास्कराचार्य गुरुत्वाकर्षण नियम कहना उचित होगा, यह वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा का परिचायक होगा।

।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
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नोट :- उपरोक्त विषय व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है,
          अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों,
          ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा    
          अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया
          गया है।

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Monday, 4 September 2017

नॉर्थ कोरिया (हाइड्रोजन बम) विनाश या सृजन

 September 04, 2017     भारतीय विज्ञान     No comments   

।। नॉर्थ कोरिया (हाइड्रोजन बम) - सामुहिक विनाश या नव सृजन।।
सृष्टि के सृजन के लिए शस्त्र तथा शास्त्र दोनों की आवश्यकता है जहाँ एक तरफ शस्त्र के बिना शास्त्र असुरक्षित हो जाता है तक्षशिला विश्वविद्यालय का विनाश जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है वहीं शास्त्र के बिना शस्त्र असंयमित हो जाता है, प्राचीन काल से लेकर अब तक धर्मग्रंथों तथा इतिहास में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। बंदर के हाथ में तलवार तथा कुपात्र के पास हथियार सदैव ही मानव तथा मानवता के लिए विनाशकारी साबित हुआ है। महाभारत युद्ध के आखिरी चरण में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा के द्वारा सामुहिक विनाश के हथियार ब्रम्हास्त्र के मुर्खतापूर्ण प्रयोग के विनाश को दुनिया ने सिर्फ सुना है तथा धर्मग्रंथों के माध्यम से इसके कुप्रभाव को समझने का प्रयत्न किया गया है।
आधुनिक युग में 6 तथा 9 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा जापान के ऊपर परमाणु बम के हमले में मानव तथा मानवता का जो संहार हुआ उसे तो दुनिया ने प्रत्यक्ष देखा है तथा उसके दर्द को अनुभव किया है। परन्तु इस विनाश का दुसरा पक्ष और भी सुन्दर तथा मानवता के लिए उपयोगी साबित हुआ। जापान पहले से ज्यादा निर्माणकारी तथा प्रकृति-प्रेमी हो गया साथ में जापानियों में पहले से ज्यादा राष्ट्रीयता की भावना आ गयी, परन्तु इसका अर्थ यह कतई नहीं समझा जा सकता है कि किसी भी देश को अन्य देशों पर इस तरह के आक्रमण की छूट मिल जाती है, अन्य देशों के सभ्यता तथा संस्कृति को नष्ट करने की छूट मिल जाती है जापान ने तरक्की की यह जापान की महानता है परन्तु जो अमेरिका ने किया उसके लिए अमेरिका कभी भी दोषमुक्त नहीं हो सकता।
वर्तमान समय में नॉर्थ कोरिया के पास हाइड्रोजन बम तथा पाकिस्तान के पास परमाणु बम का होना वाकई शांतिप्रिय राष्ट्रों के चिंता का विषय है। एक तरफ पाकिस्तान तथा अन्य देशों में कट्टरपंथी आतंकियों के बढ़ते प्रभाव के बीच परमाणु बम का होना तो वहीं दुसरी ओर नॉर्थ कोरिया के पास हाइड्रोजन बम जैसे सामुहिक विनाश के हथियार का होना जितना भयावह नहीं उससे भी ज्यादा भयावह यह है कि एक तरफ कट्टरपंथी आतंकवादियों का मकसद पुरी दुनिया में हिंसा फैलाना तो वहां दुसरी ओर नॉर्थ कोरिया का शासक का लक्ष्य ही कुछ देशों का विनाश है। इस तरह की ओछी मानसिकता चाहे पाकिस्तान की हो, नॉर्थ कोरिया की हो या किसी अन्य देशों की हो सदैव ही सृष्टि के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई है।
अतः यह आवश्यक है कि दुनिया के सभी शांतिप्रिय तथा प्रगतिशील देश शस्त्र तथा शास्त्र के बीच संतुलन की आवश्यकता को समझे एवं सृष्टि तथा संस्कृति की रक्षा के लिए भावी विनाश के उपक्रम को संयमित करे जो कि संपूर्ण मानवता को निगल लेने को आतुर है।
भारत के लिए अब वक्त आ गया है दुनिया को यह समझाने का कि सामुहिक विनाश के हथियार पर आधारित विकास वास्तविक अर्थ सामुहिक विनाश को आमंत्रण है।
सधन्यवाद,
अनिल ठाकुर।

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