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Tuesday, 12 September 2017

।। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)।।

 September 12, 2017     No comments   

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=850221778477565&id=518709388295474

।। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity)।।

मिथक:-
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Theory of Gravity) की खोज का श्रेय सर आइजक न्यूटन (1666 AD) को दिया है।

सत्यता:-
सर आइजक न्यूटन से लगभग हजारों वर्ष पूर्व ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force) पर कई  ग्रन्थों रचना हो गई थी।

(1)
यह ऋग्वेद के मन्त्र हैं :-

यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे ।
आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ।।
                  ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ३ )

अर्थात :-
सब लोकों का सूर्य्य के साथ आकर्षण और सूर्य्य आदि लोकों का परमेश्वर के साथ आकर्षण है । इन्द्र जो वायु , इसमें ईश्वर के रचे आकर्षण, प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं । उनसे सब लोकों का दिन दिन और क्षण क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है । इस हेतु से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर उधर विचल भी नहीं सकते ।

यदा सूर्य्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः ।
आदित्ते विश्वा भुवनानी येमिरे ।।३।।
                  ( ऋ० अ० ६/ अ० १ / व० ६ / म० ५ )

अर्थात :- हे परमेश्वर ! जब उन सूर्य्यादि लोकों को आपने रचा और आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने सामर्थ्य से उनका धारण कर रहे हैं , इसी कारण सूर्य्य और पृथिवी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे हैं । इन सूर्य्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है

(2)
ऋषि पिप्पलाद ( लगभग ६००० वर्ष पूर्व ) ने प्रश्न उपनिषद् में कहा :-
पायूपस्थे – अपानम् ।
                              ( प्रश्न उप० ३.४ )
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य० ।
                                            ( प्रश्न उप० ३.८ )
तथा पृथिव्याम् अभिमानिनी या देवता,
सैषा पुरुषस्य अपानवृत्तिम् आकृष्,
अपकर्षेन अनुग्रहं कुर्वती वर्तते ।
अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाशे वा उद्गच्छेत् । 
                                  (शांकर भाष्य, प्रश्न० ३.८ )
अर्थात :- अपान वायु के द्वारा ही मल मूत्र नीचे आता है । पृथिवी अपने आकर्षण शक्ति के द्वारा ही मनुष्य को रोके हुए है, अन्यथा वह आकाश में उड़ जाता ।

(3)
वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा :-
पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः ।
खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।  
                                                        (पंच०पृ०३१ )
अर्थात :- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथिवी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।

(4)
महर्षि पतञ्जली (150 ई० पूर्व) व्याकरण महाभाष्य में भी गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए लिखा :-

लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारोहति ।
पृथिवीविकारः पृथिवीमेव गच्छति आन्तर्यतः ।।  
     (महाभाष्य :- स्थानेन्तरतमः,१/१/४९ सूत्र पर )

अर्थात् :- पृथिवी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है । वह पृथिवी का विकार है, इसलिये पृथिवी पर ही आ जाता है ।

(5)
आचार्य श्रीपति ने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में कहा है :-
उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे ।।
                                          (सिद्धान्त० १५/२१ )

नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।। ( सिद्धान्त० १५/२२ )

अर्थात :- पृथिवी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथिवी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

(6)
भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इनका जन्म 1114 ई. में हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे। यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। जब इन्होंने "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक ग्रन्थ लिखा तब वें मात्र 36 वर्ष के थे। "सिद्धान्त शिरोमणि" एक विशाल ग्रन्थ है।
जिसके चार भाग हैं
(1) लीलावती (2) बीजगणित (3) गोलाध्याय और (4) ग्रह गणिताध्याय।
लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। अपनी पुत्री के नाम पर ही उन्होंने पुस्तक का नाम लीलावती रखा। यह पुस्तक पिता-पुत्री संवाद के रूप में लिखी गयी है लीलावती में बड़े ही सरल (simple) और काव्यात्मक (poetic) तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है—
"आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं,
                             गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति,
                           समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।"
     (~ सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश)

अर्थात्—
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति ( Attractions force of the earth) है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

सुझाव:-
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम को ऋग्वेद, ऋषि पिप्लाद, वराहमिहीर, महाऋषि पातंजली तथा भास्कराचार्य गुरुत्वाकर्षण नियम कहना उचित होगा, यह वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा का परिचायक होगा।

।। मानस-गणित (Vedic- Ganit) ।।
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          अपने आस-पास के पर्यावरण, ऋषि-मुनियों,
          ज्ञानियों तथा मनीषियों के लिखित तथा    
          अलिखित श्रोत के आधार पर तैयार किया
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Monday, 4 September 2017

नॉर्थ कोरिया (हाइड्रोजन बम) विनाश या सृजन

 September 04, 2017     भारतीय विज्ञान     No comments   

।। नॉर्थ कोरिया (हाइड्रोजन बम) - सामुहिक विनाश या नव सृजन।।
सृष्टि के सृजन के लिए शस्त्र तथा शास्त्र दोनों की आवश्यकता है जहाँ एक तरफ शस्त्र के बिना शास्त्र असुरक्षित हो जाता है तक्षशिला विश्वविद्यालय का विनाश जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है वहीं शास्त्र के बिना शस्त्र असंयमित हो जाता है, प्राचीन काल से लेकर अब तक धर्मग्रंथों तथा इतिहास में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। बंदर के हाथ में तलवार तथा कुपात्र के पास हथियार सदैव ही मानव तथा मानवता के लिए विनाशकारी साबित हुआ है। महाभारत युद्ध के आखिरी चरण में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा के द्वारा सामुहिक विनाश के हथियार ब्रम्हास्त्र के मुर्खतापूर्ण प्रयोग के विनाश को दुनिया ने सिर्फ सुना है तथा धर्मग्रंथों के माध्यम से इसके कुप्रभाव को समझने का प्रयत्न किया गया है।
आधुनिक युग में 6 तथा 9 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा जापान के ऊपर परमाणु बम के हमले में मानव तथा मानवता का जो संहार हुआ उसे तो दुनिया ने प्रत्यक्ष देखा है तथा उसके दर्द को अनुभव किया है। परन्तु इस विनाश का दुसरा पक्ष और भी सुन्दर तथा मानवता के लिए उपयोगी साबित हुआ। जापान पहले से ज्यादा निर्माणकारी तथा प्रकृति-प्रेमी हो गया साथ में जापानियों में पहले से ज्यादा राष्ट्रीयता की भावना आ गयी, परन्तु इसका अर्थ यह कतई नहीं समझा जा सकता है कि किसी भी देश को अन्य देशों पर इस तरह के आक्रमण की छूट मिल जाती है, अन्य देशों के सभ्यता तथा संस्कृति को नष्ट करने की छूट मिल जाती है जापान ने तरक्की की यह जापान की महानता है परन्तु जो अमेरिका ने किया उसके लिए अमेरिका कभी भी दोषमुक्त नहीं हो सकता।
वर्तमान समय में नॉर्थ कोरिया के पास हाइड्रोजन बम तथा पाकिस्तान के पास परमाणु बम का होना वाकई शांतिप्रिय राष्ट्रों के चिंता का विषय है। एक तरफ पाकिस्तान तथा अन्य देशों में कट्टरपंथी आतंकियों के बढ़ते प्रभाव के बीच परमाणु बम का होना तो वहीं दुसरी ओर नॉर्थ कोरिया के पास हाइड्रोजन बम जैसे सामुहिक विनाश के हथियार का होना जितना भयावह नहीं उससे भी ज्यादा भयावह यह है कि एक तरफ कट्टरपंथी आतंकवादियों का मकसद पुरी दुनिया में हिंसा फैलाना तो वहां दुसरी ओर नॉर्थ कोरिया का शासक का लक्ष्य ही कुछ देशों का विनाश है। इस तरह की ओछी मानसिकता चाहे पाकिस्तान की हो, नॉर्थ कोरिया की हो या किसी अन्य देशों की हो सदैव ही सृष्टि के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई है।
अतः यह आवश्यक है कि दुनिया के सभी शांतिप्रिय तथा प्रगतिशील देश शस्त्र तथा शास्त्र के बीच संतुलन की आवश्यकता को समझे एवं सृष्टि तथा संस्कृति की रक्षा के लिए भावी विनाश के उपक्रम को संयमित करे जो कि संपूर्ण मानवता को निगल लेने को आतुर है।
भारत के लिए अब वक्त आ गया है दुनिया को यह समझाने का कि सामुहिक विनाश के हथियार पर आधारित विकास वास्तविक अर्थ सामुहिक विनाश को आमंत्रण है।
सधन्यवाद,
अनिल ठाकुर।

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Sunday, 20 August 2017

फिबोनैची अनुक्रम (Fibonacci sequence) या पिंगल-विरहांक अनुक्रम

 August 20, 2017     No comments   

फिबोनैचि अनुक्रम - (Fibonacci sequence) 

भारतीयों ने संख्याओं के फिबोनैचि अनुक्रम को खोजने के लिए सबसे पहले किया था।
महर्षि पिंगला (700 BC) के "चंद्र-शास्त्र"में "मात्र-मेरू" के उथलेविकर्णों की रकम संख्याओं के फिबोनैचि अनुक्रम को जन्म देती है।भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र (100 BC), विष्णु-धर्मोत्तर पुराण  (5 वीं शताब्दी) और मातंग मुनि के बृहद्द्सी में संख्याओं के  फिबोनैचि अनुक्रम का ज्ञान बताया। पहली बार विरहंका (6 वीं शताब्दी) ने स्पष्टरूप से दिखाया कि किस प्रकार फाइबोनैचि अनुक्रम संख्याओं केविश्लेषण से छोटा (लघु L) या लंबा (गुरु S) मानक के साथ विघटितकिए जा सकते हैं। 

Syllables    Pattern           Sequence of no. 
1.                  S                                             1 
2.                  SS, L                                       2 
3.                  SSS, SL, LS                            3 
4.                  SSSS, SSL, SLS, LSS, LL      5 
5.                  SSSSS, SSSL, SSLS,             8
                     SLSS, SLL, LSSS, LSL, LLS 
6.                  SSSSSS, SSSSL, SSSLS,     13 
                     SSLSS, SLSSS, LSSS, SSLL, 
                     SLSL, SLLS, LSSL, LSLS,
                     LLSS, LLL

विरहांका ने सूत्र :- 
"F(n) = F(n -1) + F(n -2)"
के ज्ञान को प्रदर्शित किया और साबित कर दिया कि लम्बाई के एकपैटर्न को लंबाई (S) की लंबाई के एक पैटर्न के लिए लघु (S)  जोड़करबनाया जा सकता है (n -1) या लम्बा (L) मानक लंबाई (n -2) के पैटर्नके अनुसार उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि लंबाई n के पैटर्न की संख्या दोपिछले पैटर्नों की संख्या है लम्बाई के इन संख्याओं के पैटर्न संख्याओंका अनुक्रम है जो कि संख्याओं के फिबोनैचि अनुक्रम के रूप में जानाजाता है। गोपाला (11 वीं शताब्दी) ने जो अनुक्रम दिया था - 
1, 1, 2, 3, 5, 8, 13, 21,......... 
यह अनुक्रम सिद्ध करता है कि प्रत्येक संख्या अपने ठीक पहले दोसंख्याओं के योग से प्राप्त हुई है। 
और हेमचंद्र (1098 AD ) ने भी इस विषय पर बड़े पैमाने परफिबोनैची से पहले काम किया।

उपरोक्त अनुक्रम आज इटली के गणितज्ञ पीसा केलियोनार्दो (1202 AD) के अनुसार फिबोनैचि अनुक्रम के नाम सेजाना जाता है। 
आधुनिक गणितज्ञ फिबोनाची अनुक्रम को निम्न रुप से व्यक्त करते हैं - 
a, b, a+b, a+2b, 2a+3b, 3a+5b, 5a+8b, 8a+13b,......... 

परन्तु फिबोनाची अनुक्रम का नाम "पिंगला-विरहांका अनुक्रम संख्या" के रूप में होना चाहिए।

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Monday, 1 May 2017

।। प्राचीन भारतीय गणित - परिचय (Ancient Indian Mathematics - Introduction) ।।

 May 01, 2017     No comments   

।। प्राचीन भारतीय गणित का परिचय (Introduction of Ancient Indian Mathematics)।।


इहलौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान के आदि एवं अनंत श्रोत वेद है, "वेद" का भावार्थ है — अनंत ज्ञान-विज्ञान का अक्षय भण्डार। विश्व में गणित शास्त्र का उद्भव तथा विकास उतना ही प्राचीन है जितना मानव सभ्यता का इतिहास है। दुनिया के पुस्तकालयों के प्राचीनतम ग्रंथ तथा वेद संहिताओं से गणित तथा ज्योतिष को अलग-अलग शास्त्रों के रुप में मान्यता प्राप्त हो चुकी थी

  प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम्
                  (~यजुर्वेद - 30 - 10)

यजुर्वेद में खगोलशास्त्र (ज्योतिष) के विद्वान के लिए "नक्षत्रदर्श" का प्रयोग किया है तथा सलाह यह दी है कि उत्तम प्रतिभा प्राप्त करने के लिए उसके पास जाना चाहिए।

   यादसे शाबल्यां ग्रामण्यं गणकम्
                  (~यजुर्वेद - 30 - 20)

वेद में शास्त्र के रुप में गणित शब्द का नामतः उल्लेख तो नहीं किया गया है पर यह कहा है कि जल के विविध रूपों का लेखा-जोखा रखने के लिए "गणक" की सहायता ली जानी चाहिए।
शास्त्र के रुप में 'गणित' का प्राचीनतम प्रयोग 'लगध ऋषि' द्वारा प्रोक्त 'वेदांग-ज्योतिष' नामक ग्रंथ के एक श्लोक में माना जाता है —

  यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि वर्तते ।।
                                        (~वेदांग ज्योतिष)

अर्थात् —
जिस प्रकार मोर को शिखा सबसे उपर होता है, नाग के मणि भी सबसे उपर होते हैं साथ में दोनों ही बहुमूल्य होते हैं। इसी तरह सभी वेद-शास्त्रों में गणित को सर्वोच्च तथा बहुमूल्य कहा गया है।
परन्तु इससे भी पूर्व छन्दयोग्य उपनिषद् में सनतकुमार के पुछने पर देवऋषि नारद ने जो 18 अधीत विद्याओं की सूची प्रस्तुत की है —

स होवाच —
ऋग्वेदं भगवोsध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचम वेदानं वेदं पित्र्यं "राशिं" दैवं निधि वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां "क्षत्रविद्यां" नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोsध्येमि ।
                    (~छन्दयोग्य उपनिषद् - 7. 1. 2)

इसके शंकरभाष्य में 'राशिम्' का अर्थ 'राशि गणितम्' किया है,
उसमें ज्योतिष के लिए नक्षत्र विद्या तथा गणित के लिए राशि विद्या ' नाम प्रदान किया है।
अतः हम कह सकते हैं कि "गणित" समस्त ज्ञान-विज्ञान का मेरुदंड है। ( Ganit is the back bone of the all sciences.)

प्राचीन भारतीय गणित को पांच कालखण्डों में विभाजित किया जा सकता है —

(1) वैदिक काल - 14,500 BC से 800 BC तक
चारों वेद, शुल्बसूत्र, लगध मुनि इत्यादि
(2) पूर्व मध्यकाल 800 BC से 400 AD तक
पाणिनी, पिंगला, कौटिल्य, सूर्य सिद्धांत
(3) मध्यकाल अथवा स्वर्णयुग 400 AD से 1200 AD तक
आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य प्रथम, ब्रह्मगुप्त, श्रीधराचार्य, महावीराचार्य, मंजुलाचार्य, आर्यभट्ट द्वितीय, भास्कराचार्य द्वितीय इत्यादि
(4) उत्तर मध्यकाल 1200 AD से 1800 AD तक
नारायणा पंडित, परमेश्वरा, नीलकण्ठं इत्यादि
(5) वर्तमान - 1800 AD से आज तक
श्रीनिवासन रामानुजन, स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ इत्यादि

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Saturday, 25 March 2017

।। अयोध्या राम मंदिर - शहीदों की गाथा।।

 March 25, 2017     No comments   

अयोध्या का इतिहास --
जिसे पढ़कर आप रो पड़ेंगे। कृपया सच्चे हिन्दुओं की संतानें ही इस लेख को पढ़ें।

जब बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ उस समय जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी। महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकान अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी महात्मा श्यामनन्द के ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा।

ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा।

जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी, हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना । अत: जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंपकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए ।

सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा, बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास की जमीनों में बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया॥ और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर को उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया। बाबा श्यामनन्द जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुए और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ। दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित कर दी और खुद हिमालय की और तपस्या करने चले गए।

मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट लिए गए. जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई उस समय भीटी के राजपूत राजा महताब सिंह, बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे, अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी और अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल कर १ लाख चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४ लाख ५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।

रामभक्तों ने सौगंध ले रखी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे। रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी १ लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए। श्रीराम जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस भीषण कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के
मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में लखौरी इंटों के साथ ।

इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया.
इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की " जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नीव
मस्जिद बनवाने के लिए दी गयी थी। "

उस समय अयोध्या से ६ मील की दूरी पर सनेथू नाम का एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आस पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया॥ देवीदीन पाण्डेय ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं ..आप के पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी। आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥

देवीदीन पाण्डेय की प्रार्थना से दो दिन के भीतर 90 हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि पर जबरदस्त धावा बोल दिया ।

शाही सेना से लगातार ५ दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीन पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेय जी की खोपड़ी पर वार कर दिया। देवीदीन
पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपनी पगड़ी से खोपड़ी को बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया। इसी बीच मीरबाँकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त हुए..
जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं॥

पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद हंसवर के राजपूत महाराजा रणविजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए।

जन्मभूमि में 25 हजार हिन्दुओं का रक्त फिर बहा। रानी जयराज कुमारी हंसवर के स्वर्गीय महाराज रणविजय सिंह की पत्नी थी। जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज कुमारी की सहायता की। साथ ही स्वामी महेश्वरानंद जी ने सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने २४ हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ हुमायूँ के समय में कुल १० हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। १०वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।

लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी, इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीराम जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3 हजार वीर नारियों के रक्त से लाल हो गयी रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया। स्वामी बलरामचारी जी ने गांव गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में कम से कम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था। थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे।

उस समय का मुग़ल शासक अकबर था। शाही सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी.. अतः अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया।

लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य
गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी ..

इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष एवं हिन्दुस्थान पर मुगलों की ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर की इस कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त
नहीं बहा।

यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा। फिर औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलाकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला।

औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशी क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे वीर ये जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे। लम्बे समय तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और अयोध्या की धरती पर उनका रक्त बहता रहा।

ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय
सिर पर पगड़ी नहीं बांधते, जूता नहीं पहनते, छाता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे, छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं पहनेंगे।

1640 ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे। जब जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना भी मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़ खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया ।
चिमटाधारी साधुओं के चिमटे की मार से मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी ।

जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे ये आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है, यह समय सन् 1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला। ब्रहमकुंड वही जगह जहां आजकल गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु
एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े। इन वीरों कें सुनियोजित हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4
साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मे एक बार फिर श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया। इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी नागरिकों तक को नहीं छोड़ा।

जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलों ने उसमे फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज
भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है, और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है। शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था।

औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत, पुष्प और जल चढाती रहती थी. नबाब सहादत अली के समय 1763 ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के राजपूत राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की “ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी। “लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर
नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया।

इस संग्राम मे भीती, हंसवर, मकरही, खजुरहट, दीयरा, अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे।

हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।

मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया।
जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा।

नावाब वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया ।

फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा "इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ। दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई।

अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था । इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये
अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।
हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया।

चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया॥ जिसमे पुनः रामलला की स्थापना की गयी। कुछ जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार नहीं हुई और कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल गयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुर शाह जफर के समय
में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर अली के साथ जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ मे दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया। जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया...

इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के कारण रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल हो गया ...

अन्तिम बलिदान ...
३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के लालची मुलायम सिंह यादव के द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन २ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं।

सरकार ने मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट रामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१ को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया।

लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया। परन्तु हिन्दू समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवं नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े आराध्य भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं। जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना रक्त पानी की तरह बहाया। आज वही हिन्दू बेशर्मी से इसे "एक विवादित स्थल" कहता है।

सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज भी जन्मभूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ा है।
वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर नहीं बनने देना चाहते हैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें नीचा दिखाया जा सके।
जिस कौम ने अपने ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते हैं हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के उद्धार के लिए आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन नहीं किया और सरकार पर दबाव नहीं बनाया आज भी वे बाबरी-विध्वंस की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते हैं। और मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण उलझा हुआ है।

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